लक्ष्‍य सेन यानी सोने पर ही साधा लक्ष्‍य

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16 बरस के लक्ष्य सेन ने पिछले दिनों बैडमिंटन की दुनिया में भारत का नाम 53 बरस के बाद एक बार फिर रौशन कर दिया, जब उसने एशियन जूनियर चैंपियनशिप के पुरूष वर्ग में स्वर्ण पदक जीता।
लक्ष्‍य ने मौजूदा जूनियर विश्व चैंपियन थाईलैंड के कुनलावुत वितिदसर्न को सीधे सेटों में हराकर खिताब अपने नाम किया। पहले गेम में लक्ष्य को प्रतिद्वंद्वी के आक्रामक खेल को समझने में कुछ वक्त लगा और उसके बाद अपनी लय में आते हुए उसने कांटे के मुकाबले में पहला गेम 21-19 से और दूसरा गेम 21-18 से जीत लिया। दोनो गेम के स्कोर से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुकाबले में टक्कर लगभग बराबरी की थी, लेकिन पलड़ा भारी रहा लक्ष्य सेन का।इस जीत के साथ भारत ने 53 साल बाद यह प्रतियोगिता जीतने में कामयाबी पायी है। 1965 में गौरव ठक्कर ने इस प्रतियोगिता का स्वर्ण पदक जीता था।
प्रकाश पादुकोण ने संवारी लक्ष्य की प्रतिभा
महिला वर्ग में पीवी सिंधु ने 2012 में इस टूर्नामेंट का गोल्ड जीता था। 2016 में भी लक्ष्य ने इस प्रतियोगिता में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था। स्वर्ण पदक को दांतों से दबाकर जीत का स्वाद लेने वाले लक्ष्य ने कहा, ‘मैं यह टूर्नामेंट जीतकर खुश हूं। हर मैच के बाद मेरा ध्यान थकान से उबरने पर था। मैं खुश हूं कि अच्छा खेल सका और जीत दर्ज कर सका। भारत में बैडमिंटन को लोकप्रिय करने का श्रेय प्रकाश पादुकोण को जाता है और लक्ष्य की प्रतिभा को संवारने का श्रेय भी प्रकाश पादुकोण को जाता है। हालांकि लक्ष्य ने इस खेल में आगे बढ़ने के दौरान सबसे पहले अपने गुरू के जूते में ही पैर रखा। 46 साल पहले साल 1971 की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में बेंगलुरु के 16 साल के लड़के प्रकाश पादुकोण ने जूनियर ब्वायज सिंगल्स और मेन्स सिंगल्स का टाइटल अपने नाम कर इतिहास रचा था।

अल्मोड़ा के रहने वाले हैं लक्ष्य सेन
उस समय प्रकाश पादुकोण राष्ट्रीय खेलों के फाइनल में पहुंचने वाले सबसे युवा खिलाड़ी थे और लक्ष्य सेन ने पिछले साल 15 साल की उम्र में फाइनल में जगह बनाकर उनका रिकार्ड तोड़ा। हालांकि सबसे कम उम्र में नेशनल चैंपियन बनने का रिकॉर्ड आज भी प्रकाश पादुकोण के नाम पर कायम है, क्योंकि फाइनल में लक्ष्य 24 साल के पूर्व चैंपियन सौरभ वर्मा से हार गए थे। लक्ष्य को बैडमिंटन का खेल विरासत में मिला है। लक्ष्य के पिता डीके सेन भारत के जाने माने बैडमिंटन कोच हैं। अल्मोड़ा के रहने वाले लक्ष्य को पहाड़ी इलाके पर रहने का भी फायदा हुआ। इससे उनके पैर काफी मजबूत हैं, जो उनके खेल को बेहतर बनाने में सहायक हैं।

सिर्फ 10 साल की उम्र में शुरू कर दी थी ट्रेनिंग
वर्ष 2010 में लक्ष्य की उम्र मात्र 10 बरस की थी और उनके बड़े भाई चिराग सेन ने यूनियन बैंक ऑल इंडिया बैडमिंटन सब जूनियर बैडमिंटन टूर्नामेंट में अंडर 13 का एकल खिताब जीता, जिसके बाद दो बार के राष्ट्रीय चैंपियन विमल कुमार ने चिराग को प्रशिक्षण देने का फैसला किया, लेकिन इसी दौरान उन्होंने लक्ष्य को भी खेलते हुए देखा तो उन्हें भी ट्रेनिंग के लिए चुन लिया। लक्ष्य जब ट्रेनिंग के लिए बेंगलुरु गए तो सिर्फ साढ़े नौ साल के थे, लेकिन उनके खेल की चमक देखकर विमल कुमार ने प्रकाश पादुकोण से उन्हें ट्रेनिंग देने को कहा और लक्ष्य को पहली बार खेलते देख प्रकाश भी काफी प्रभावित हुए।

‘लक्ष्य सेन में जीतने की भूख है’
विमल कुमार बताते हैं कि लक्ष्य में जीतने की ऐसी भूख थी कि हर मैच के बाद वह अपनी गलतियों से सीखता और खुद के खेल में सुधार करता। शुरू में अगर वह कोई मैच हार जाता था तो एक तरफ जाकर रोया करता था। अंडर 11 के फाइनल मुकाबले में हारने के बाद उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन धीरे धीरे उसने अपनी आदत में सुधार किया और हार को भी सहज भाव से लेने लगा, लेकिन अपने खेल में सुधार का जज्बा उसमें सदा बना रहा। लक्ष्य अब तक जूनियर एकल में अंडर 13, अंडर 17, और अंडर 19 का खिताब अपने नाम कर चुके लक्ष्य ने कई इंटरनेशनल मेडल भी जीते हैं। सीनियर लेवल पर लक्ष्य ने पहली बार साल 2016 में इटानगर में हुई ऑल इंडिया सीनियर चैंपियनशिप में अपनी पहचान बनाई।

‘लक्ष्य का फुटवर्क सैयद मोदी की तरह है’
उन्होने सैट्स इंडिया इंटरनेशनल सीरीज का खिताब जीत कर सीनियर लेवल पर अपना पहला खिताब जीता। विमल कुमार लक्ष्य की तारीफ करते हुए कहते हैं, ”वह उसी तरह खेलता है जिस तरह प्रकाश अपने समय में खेला करते थे। लक्ष्य नेट पर काफी मजबूत है जिसके कारण वह रैली को आसानी से कंट्रोल कर सकता है। वह अपने खेल पर काफी मेहनत करता है। उसकी शैली जहां प्रकाश पादुकोण से मिलती है, वहीं उसका फुटवर्क महान खिलाड़ी सैयद मोदी की याद दिलाता है। इसमें संदेह नहीं कि अपने खेल में बैडमिंटन के दो महानतम खिलाड़ियों की झलक दिखाने वाला लक्ष्य सेन आने वाले समय में इस खेल का एक मजबूत हस्ताक्षर बनने के साथ ही दुनिया के नक्शे पर भारत का नाम सुनहरी हरफों से लिखेगा।

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