नेताओ! धोखे की मीनार बनेगी मौत का सबब

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विमानों के लिए खतरा बने 16 सौ हाई जेनरेशन टावर पर सीबीआई और सरकार का महाझूठ उजागर करती प्रभात रंजन दीन की रिपोर्ट

airplaneयह भ्रष्टाचार की ऐसी विचित्र पटकथा है जो अनगिनत लोगों की मौत का सबब बनने वाली है। इस भ्रष्टाचार-कथा में यूपी के नेता-नौकरशाहों के साथ-साथ केंद्र सरकार और सीबीआई के शीर्ष अधिकारी सब अहम किरदार हैं। भ्रष्टाचार में सब शामिल हैं और आधिकारिक रूप से भी झूठ बोलने से परहेज नहीं कर रहे। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार का ताजा हैरतअंगेज झूठ आपके सामने रखें उसके पहले, जमीन छोड़ कर हवा में उडऩे वाले नेताओं-नौकरशाहों को आगाह करने वाली सूचना दे दें। भ्रष्टाचार की जिस जमीन पर आम आदमी को रहने के लिए विवश कर जो नेता खुद हवा में तफरीह कर रहे हैं, वही उनकी मौत का सबब भी बनने वाली है। हवाई जहाज पर उड़ते हुए उनका विमान किसी ‘हाई-जेनरेशन टावर’ से टकराएगा और खील-खील होकर बिखर जाएगा। नागरिक उड्डयन से जुड़े विमानन विशेषज्ञ यह आशंका जताते हैं और राज्य सरकार के दस्तावेज इन आशकाओं की तस्दीक करते हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि विमानों के ऐसे खतरे में उड़ान भरने की विवशता इन्हीं नेताओं-नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के कारण खड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश में ऐसे एक हजार छह सौ ‘हाई-जेनरेशन टावर’ की शिनाख्त हुई है जो विमानों के लिए भीषण खतरनाक पाए गए हैं। विमानों के लिए हौलनाक हादसे को निमंत्रण देने वाले ये टावर यह नहीं देखेंगे कि कौन से विमान पर आम सम्पन्न लोग हैं या किस विमान पर सरकारी धन लूट कर अतिसम्पन्न हो चुके नेता-नौकरशाह सवार हैं। हाई-वोल्टेज से खाक होने वालों को श्मशान ले जाने की जरूरत भी नहीं रह जाएगी।

आइए इस विचित्र पटकथा के विस्तार में चलते हैं। विमानों के उड़ान में जो खतरे की आशंका है, उसके बारे में उत्तर प्रदेश शासन और प्रशासन को पता है। लेकिन इसे दबाए रखने में ही सत्ता अलमबरदारों को भलाई दिखती है। खतरे की मीनारों के रूप में ये जो 1,600 ‘हाई-जेनरेशन टावर’ शिनाख्त किए गए हैं, ये सब विदेशी कम्पनी ‘हुंडई’ और देसी धनपशु कम्पनी ‘आरपीजी’ द्वारा पांच हजार करोड़ रुपए में स्थापित किए गए हैं। देश के महालेखाकार (कैग) ने कोयला आवंटन में विदेशी कम्पनियों और कॉरपोरेट घरानों को उपकृत किए जाने की करतूतों का खुलासा किया तो सत्ता सियासतदान बुरा मान गए। विदेशी कम्पनियों और देसी पूंजी घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए उत्तर प्रदेश में जो खतरे के स्तम्भ स्थापित कराए गए, इसकी फाइल खोलने पर भी प्रदेशी नेता-नौकरशाह बुरा मानेंगे। अपने देश के नेताओं-नौकरशाहों की फितरत है कि ये जितना ही बुरा मानते हैं, उतनी ही प्रगाढ़ता से चोरी का सिलसिला और बढ़ा देते हैं, शर्माते नहीं हैं।

जिन देसी-विदेशी कम्पनियों ने ये ‘हाई-जेनरेशन टावर’ लगाए थे, उन्हें ही हवाई जहाजों को अलर्ट करने वाले उपकरण भी लगाने थे और टावरों में खास तरह की पेंटिंग करानी थी जो दूर से ही विमानों को सतर्क कर सके। लेकिन उन कम्पनियों ने ऐसा नहीं किया। नौकरशाहों ने इसी बहाने लूट के एक और जरिए का पहले से ही रास्ता तलाश रखा था। ‘हाई-जेनरेशन टावर’ लगाने के लिए जो ‘ग्लोबल टेंडर’ आमंत्रित किया गया था उसके अनुबंध-दस्तावेज (बिड-डॉक्युमेंट) में से वे सारे प्रावधान (क्लॉज) पहले ही हटा दिए गए थे, जिसके तहत टावर स्थापित करने वाली कम्पनियां टावरों में पेंटिंग कराने और अलर्ट उपकरण लगाने के लिए बाध्य होतीं। एक तरफ इन कम्पनियों को करोड़ों रुपए की बचत कराई गई तो दूसरी तरफ टावरों में पेंटिंग और उपकरण लगाने के लिए फिर अलग से टेंडर निकाला गया। इस टेंडर में भी लूट का स्कोप बनाए रखने के लिए अधिकारियों ने माप (एरिया) के हिसाब से टावरों में पेंटिंग कराने के बजाय टावरों के वजन के हिसाब से पेंटिंग कराने का हास्यास्पद प्रावधान कर दिया। अब आप खुद सोचिए कि भारी स्टील के विशालकाय टावरों का वजन ‘तौल’ कर उस हिसाब से पेंटिंग का खर्च निकालना कितनी शातिर ‘बुद्धि-यों’ का परिणाम था और उससे सरकार को कितना भारी वित्तीय नुकसान होता। पांच हजार करोड़ के भारी खर्चे पर आठ सौ केवीए की ट्रांसमिशन लाइन ले जाने के लिए सोनभद्र के अनपरा से उन्नाव और आगरा तक हाई-जेनरेश टावर का जाल तो बिछा दिया गया लेकिन उस पर वायुयानों को सचेत करने वाले उपकरण नहीं लगे और टावरों पर पेंटिंग नहीं हुई। ग्लोबल टेंडर में ग्लोबल घपले के उजागर होने के बावजूद मामले को दबाए जाने पर अदालत ने सीधे तौर पर प्रदेश सरकार को सीबीआई से जांच कराने का आदेश दिया। सरकार ने सीबीआई जांच की अधिसूचना भी जारी कर दी लेकिन मामले को प्रशासनिक गुत्थियों में उलझाए रखा और कुछ मामले को अलग कर उसे सतर्कता अधिष्ठान से जांच के लिए भेज दिया।

सतर्कता जांच में यह भेद खुला कि ‘ग्लोबल टेंडर’ के बिड-डॉक्युमेंट से महत्वपूर्ण प्रावधान हटाए जाने की हरकतों पर पर्दा डालने के इरादे से तत्कालीन ऊर्जा सचिव अतुल चतुर्वेदी ने सरकार के कानूनी सलाहकार एवं न्याय विभाग के प्रमुख सचिव रहे एनके मेहरोत्रा से कानूनी सलाह मांगी और इसी जरिए सबने मिल कर मामले की सुनियोजित लीपापोती कर दी। ये वही एनके मेहरोत्रा हैं जो प्रदेश के मौजूदा लोकायुक्त हैं और तमाम मंत्रियों के भ्रष्टाचार की जांच कर रहे हैं। सतर्कता अधिष्ठान ने अपनी जांच में शीर्ष नौकरशाहों और नेताओं की साठगांठ से हुई घपलेबाजी पकड़ ली, यह भी पकड़ लिया कि ग्लोबल टेंडर के लिए जारी हुए बिड-डॉक्युमेंट में से महत्वपूर्ण हिस्से (प्रावधान) सुनियोजित तरीके से हटाए गए थे। यह ‘फ्रॉड’ पकड़े जाने पर उस समय के ऊर्जा सचिव ने फौरन यह लिख मारा कि टाइपिंग की गलती (टाइपिंग एरर) से ऐसा हुआ। उस पर कानूनी सलाहकार ने मुहर भी लगा दी। घोटालेबाज इतने शातिर थे कि कोर्ट में तीन-तीन बार बम की अफवाह फैला कर सुनवाई स्थगित करा दी और इस बीच न्यायाधीश एएस गिल का तबादला भी हो गया। फिर कौन सुनने वाला था! ‘बड़े लोगों’ ने घोटाले की गुत्थियां इस कदर उलझा दीं कि सतर्कता अधिष्ठान ने भी त्राहिमाम बोल कर मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश कर दी। फिर साजिश शुरू हुई कि किसी भी तरह सीबीआई की जांच न होने पाए। इस षडयंत्र में उत्तर प्रदेश के नेता-नौकरशाहों के साथ-साथ केंद्र सरकार और यहां तक कि खुद सीबीआई भी शामिल हो गई। सीबीआई ने प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव में इस मामले की जांच से ही इन्कार कर दिया। सीबीआई ने औपचारिक रूप से उत्तर प्रदेश सरकार को यह जानकारी दे दी कि तकनीकी योग्यता (विशेषज्ञता) नहीं होने के कारण वह जांच नहीं कर सकती। एक झूठ छिपाने के लिए हजार झूठ बोलने की कहावत सीबीआई ने साबित की। वह अपने पहले पत्र को भूल गई और फिर झूठ बोला कि उसने मामले की प्राथमिक जांच के बाद उसे विस्तृत जांच के लायक नहीं पाया। सीबीआई का यह पत्र भी उत्तर प्रदेश सरकार के पास आ गया। जांच के बारे में पूछे जाने पर तीसरी बार कार्मिक मंत्रालय के उप सचिव मनीषा सक्सेना ने यूपी के मुख्य सचिव को लिखा कि ‘घोटाले और धोखाधड़ी में लिप्त व्यक्तियों के सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा विवरण उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।’ हालांकि केंद्र सरकार के इस पत्र में सीबीआई के हवाले से फिर यह लिखा गया कि सीबीआई ने प्राथमिक जांच के बाद इसे विस्तृत जांच के उपयुक्त नहीं पाया।

केंद्र के विरोधाभासी पत्र पर अब यूपी सरकार का सफेद झूठ देखिए। उसने कार्मिक मंत्रालय की तरफ से भेजे गए उक्त पत्र के मिलने से ही इन्कार कर दिया। इस नौ अगस्त को सरकार ने लिखित तौर पर यह झूठ बोला कि कार्मिक मंत्रालय का संदर्भित पत्र शासन को प्राप्त ही नहीं हुआ है। आपने देखा न भ्रष्टाचार और झूठ का अभूतपूर्व ‘यूपीआइट-कॉम्बिनेशन’! सीबीआई की तरफ से यूपी सरकार को जो पत्र भेजे गए या जो पत्र कार्मिक मंत्रालय ने यहां भेजे, या यूपी की सरकार ने आधिकारिक तौर पर जो झूठ बोले, वे सारे दस्तावेज हमारे पास सुरक्षित हैं। ताकि सनद रहे…

साभार: कैनविज

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