भारत रत्न पर ध्यानचंद का पहला हक

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सैय्यद मोहम्मद अब्बास
सचिन दुनिया के महान खिलाड़ी हैं और मेरे पसंदीदा क्रिकेटर भी लेकिन ध्यानचंद उनसे कहीं ऊपर हैं। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा कि मैं हॉकी प्लेयर हूं बल्कि इसलिए कह रहा हूं कि ध्यानचंद ने हॉकी को उस मुकाम तक पहुंचाया जहां आज सिर्फ कल्पना की जा सकती है। ध्यानचंद और हॉकी एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद का वहीं स्थान है जो फुटबाल में पेले और क्रिकेट में डॉन ब्रेडमैन का। जहां तक भारत रत्न की बात है तो मेरा मानना है कि यह सम्मान सचिन से पहले ध्यानचंद को मिले। खेल के क्षेत्र में भारत रत्न पर पहला हक तो बेशक ध्यानचंद का ही है। कैनविज टाइम्स से विशेष बातचीत में भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ी दानिश मुज्तबा ने भारत रत् न पुरस्कार पर बेबाक टिप्पणी की।
दानिश ने स्वीकार किया कि ओलम्पिक में टीम असफल रही है लेकिन जल्द ही भारतीय हॉकी टीम अपनी खोई हुई प्रतिष्ठïा वापस पा ले लेगी। ओलम्पिक में प्रदर्शन से मैं निराश जरूर हूं लेकिन टूटा नहीं। असफल हुआ हूं लेकिन परास्त नहीं। हमारी तैयारी अच्छी थी लेकिन हम मैदान पर सर्वश्रेष्ठï नहीं कर पाए।
हार पर दानिश बेबाकी से अपनी राय रखते हैं और कहते हैं कि हार पर कोई बहाना नहीं होता है हमने लचर प्रदर्शन किया और विरोधी टीम से पिटते रहे। हार जीत तो खेल का हिस्सा होता है हम अपनी हार स्वीकार करते हैं।
दानिश मानते हैं कि ओलम्पिक जैसे बड़े टूर्नामेंट में दबाव होता है। हॉलैंड के खिलाफ हम मजबूत स्थिति में थे लेकिन भाग्य ने हमारा साथ नहीं दिया। अगर वह मैच ड्रॉ होता तो ओलम्पिक में तस्वीर बदली हुई होती।
ब्लू टर्फ तो कहीं हार का कारण तो नहीं बनीं इस पर दानिश बोले अरे भाई ऐसा नहीं है। हमने ब्लू टर्फ पर खूब मैच खेले हैं और अभ्यास भी किया है। यूरोप के दौरे पर हम ब्लू टर्फ पर ही खेले हैं। फिलहाल ब्लू टर्फ हमारी हार का कारण नहीं बनी है क्योंकि हमने इस पर पहले से अभ्यास किया था। यूरोपीय टूर के दौरान इसी टर्फ पर खेले थे। ऐसे में मुझे यह कही से नहीं लगता है यह टर्फ हमारी हार का कारण बनी। ग्रास की हॉकी और एस्ट्रो ट्रर्फ की हॉकी में बहुत अंतर होता है। स्लाइड शॉट का एस्ट्रो टर्फ पर ज्यादा प्रयोग किया जाता है यही आधुनिक तकनीक है जिस पर ध्यान दिया जा रहा है।
हार के लिए कोच को दोष देना ठीक नहीं। कोच माइकल नोब्स से खिलाडिय़ों को कोई शिकायत नहीं। कोच केवल सिखा सकता है लेकिन मैदान पर खिलाड़ी अपने हुनर को लेकर उतरता है। कोच केवल बता सकता है लेकिन मैदान पर तो खिलाड़ी को ही खेलना है। माइकल नोब्स बेहद शानदार कोच हैं। उन्होंने खिलाडिय़ों को तराशा है। इसे हार से जोड़ कर न देखें।
यूपी में हॉकी का भविष्य बहुत उज्जवल है। प्रदेश में हॉकी की कई प्रतिभाएं है बस उनके हुनर को पहचाने की देर है। हॉकी में दो संघो की लड़ाई से प्रदेश की प्रतिभाएं मार खा रही है। दरअसल खिलाडिय़ों को यह मालूम नहीं होता है कि वह जिस संघ से जुड़ा है वह मान्यता प्राप्त है या नहीं। इसके चक्कर में उसका करियर दांव पर लग जाता है। प्रदेश में एस्ट्रो टर्फ की भी भारी कमी है। मैं चाहता हूं कि हॉकी के लिए निजी संस्थाए आगे आएं और क्रिकेट का दस प्रतिशत भी हॉकी को सहयोग मिल जाए तो हॉकी का सुनहरा दौर फिर लौट आएगा। अभी मैं कड़ी मेहनत कर रहा हूं ताकि भारतीय हॉकी टीम में अपना स्थान और मजबूत कर सकूं।
साभार: कैनविज टाइम्स

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