उन्नाव में टूट रहा प्रधानमंत्री का सपना

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उन्‍नाव से सर्वेश रावत की विशेष खबर

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

प्रख्यात जनकवि अदम गोंडवी की कविताएं गांवों पर एकदम खरी उतरती हैं। केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश को खुले में शौच से मुक्त करने के संकल्प को उन्हीं के अफसर चूना लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत के सपने में सेंध लग रही है। शौचालय कागजों में बन रहे हैं और सफाई सरकारी राजकोष की हो रही है। हापुड़ में थाना बहादुरगढ़ क्षेत्र के कई गाँवों व चंदौली के धानापुर ब्लाक के दो गांवों व चहनियां ब्लाक के तीन गांवों में शौचालय के नाम पर अफसर लाखों रुपए डकार गये वहीं अब उन्नाव के हसनगंज ब्लॉक में बिना शौचालय बनवाये पूरे के पूरे गांव खुले में शौच से मुक्त हो रहे हैं। बिना एक भी ईंट धरे कागजों पर शौचालयों की बाढ़ लाने अफसरों की पोल गांव वाले ही खोल रहे हैं।

अपने आकाओं को खुश करने के लिए अफसरों ने उन्नाव के हसनगंज ब्लॉक की तीन ग्राम पंचायतों को ओडीएफ घोषित करवाने के लिए सारे नियम कानून ही दरकिनार कर दिए गये। यहां के गांवों में शौचालय के नाम पर एक भी ईंट नहीं रखी गई। कागजों पर ही कई गांव खुले में शौच से मुक्त यानी ओडीएफ दिखा दिए गये। ग्राम पंचायत जिन्दासपुर में 250 घरों में मुश्किल से ही 50 घरों में ही शौचालय बने हैं। यह शौचालय भी स्थानीय निवासियों ने अपने पैसों से बनवाये हैं। रघुराई ने बताया कि शौचालय न होने से शौच के लिए खेतों में जाना पड़ता है लेकिन खेतों में लोग काम करते है तो बगैर शौच के ही वापस लौटना मजबूरी बन जाती है। गांव के लोग बताते है कि ग्राम सभा सैरपुर में पिछली प्रधानी में शौचालय बना था जो एक साल में ही टूट गया। बेटियों बहनों व बहुओं को बाहर शौच न जाना पड़े इसके लिए उन्होंने अपने खर्चे से बनवाया है।
कोरौरा गांव में 12 सौ की आबादी है जिसमे लगभग 3 सौ घर बने है जबकि शौचालय मुश्किल से 15 घरों में ही है। बाकी घर वाले खुले में शौच को बाहर जाने के लिए आज भी मजबूर है। अफसरों व बाबुओं ने यहां शौचालयों के नाम पर कागजों में ही खानापूरी की लेकिन हकीकत में एक भी शौचालय नहीं बना। गांव वाले बताते हैं कि शौचालय न होने से दूसरे गांव के लोग यहां अपनी बेटी नहीं देना चाहते। शौचालयों के न होने से गांव के लोगों को तब बहुत शर्मिंदा होना पड़ता है जब कोई मेहमान आ जाता है। जब सम्बन्धित अधिकारियों से इस बारे में पूछा गया तो बगले झांकते नजर आये।
सचमुच क्या हमारा देश बदल रहा है। कागजों पर ही सरकार के सपने साकार हो रहे हैं। जहां सोच वहां शौचालयों पर भ््राष्टïाचार की गंदी नजर पड़ चुकी है। केन्द्र व राज्य सरकार के स्वच्छ भारत अभियान को उनके ही अफसर विफल करने में जुटे हैं। अपनी जेबें भरने के खातिर वह गांव की बहन बेटियों की इज्जत को भी ताक पर रख रहे हैं। आखिर हम कब समझेंगे कि खुले में शौच से मुक्त का सपना भी अपना है।

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