मायावती के जन्मदिन 15 जनवरी पर विशेष
लखनऊ। स्टेट गेस्ट हाउस कांड को अपने जीवन में कभी भुला न सकने वाली मायावती ने वर्षों बाद आगे बढ़ते हुए शनिवार को जिस अंदाज में सपा के साथ प्रेसवार्ता साझा की उसने देश की राजनीति खासतौर पर भाजपा खेमे में हलचल मचा दी है। उनके तेवरों ने जता भी दिया कि सपा बसपा गठबंधन को लीड भी वही करेंगी। वर्ष 2014 में बसपा का खाता न खुलने के बावजूद मायावती इस बार यानी 2019 के लोकसभा चुनाव में मजबूती के साथ मैदान में आ डटी हैं। यूपी के बाहर राहुल भले ही मोदी के खिलाफ मोर्चा खोले रहें लेकिन यूपी में मोदी समेत पूरी भाजपा मायावती से ही जूझती दिखेगी। शनिवार को सपा के साथ मायावती ने गठबंधन की राह में जो कदम रखा है वह यूपी की राजनीति में अब तक का बड़ा टर्निंग प्वाइंट है। सीटों का बंटवारा भी दोनो की सहमति से हो गया है। दोनों ने बराबर सीटें एक दूसरे के लिए छोड़ी हैं। इसमें अन्य छोटे दलों के लिए भी गुजाइश छोड़ी है। गठबंधन को समर्थन देने औश्र मायावती को जन्मदिन की बधाई देने के लिए लालू के प़ुत्र तेजस्वी यादव लखनउ में दो दिन से डेरा डाले हुए हैं।

अखिलेश राहुल को नहीं मायावती को बनाना चाहते हैं पीएम
उत्‍तर से दक्षिण तक मायावती ने हाल के वर्षों में जिस तरह अपने कद का विस्तार किया है वह काबिले तारीफ है। अलग अलग कारणों से कई पार्टियों के नेता मायावती को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने या कहा जाये मानने लगे हैं। मई में सबसे पहले जेडीएस के नेता एचडी कुमारस्वामी ने कहा था कि उनकी पार्टी की ओर से मायावती प्रधानमंत्री पद की दावेदार होंगी। यह अलग बात है कि बाद में कुमारस्वामी ने कांग्रेस की मदद से सरकार बनाई और दूसरी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। अखिलेश यादव ने साफ कहा है कि प्रधानमंत्री के लिए राहुल उन्‍हें मंजूर नहीं हैं। सपा के ही वरिष्‍ठ नेता ने फूलपुर चुनाव पर जीत के बाद कहा था कि हमारे नेता अखिलेश जी यूपी देखेंगे और बहन जी यानी मायावती अब देश की बागडोर सम्‍भालेंगी। इस नेता ने गलत नहीं कहा था तब। आज यह बात सबने देखी भी। राजधानी में दोनों दल के कार्यकर्ताओं की खुशी भी देखते ही बन रही है। कहीं बुआ भतीजे जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं तो कहीं मिठाई बांटी जा रही है। उधर राहुल गांधी ने भी गठबंधन पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी से बचते हुए शुभकामनाएं दी हैं।

अब सपा बसपा गठबंधन की नेता हैं मायावती

अखिलेश यादव ने बिना कहे मायावती को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया है। अखिलेश ने यहां तक कहा है कि मायावती का अपमान मेरा अपमान है! अस्सी लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में मायावती कितनी जरूरी हैं, यह हाल के उप-चुनावों से साबित हो जाता है. गोरखपुर, फूलपुर से लेकर कैराना और नूरपुर के प्रतिष्ठा वाले लोकसभा-विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी को हराने में उनकी बड़ी भूमिका रही। बसपा ने कहीं घोषित तौर पर तो कहीं मौन संकेतों से विपक्ष का साथ दिया। मायावती के समर्थकों के लिए उनका एक इशारा ही काफी होता है। मायावती भले ही कांग्रेस से परहेज करें लेकिन कांग्रेस को कभी भी मायावती से परहेज नहीं रहा है और आगे भी नहीं रहेगा। राहुल गांधी मायावती के खिलाफ बोलने से बचते हैं तो सोनिया भी मायावती को महत्व देती हैं। मई में बेंगलुरु के विपक्षी मंच के बीचोबीच न केवल सोनिया गांधी ने मायावती को गले लगाया बल्कि बीएसपी के एकमात्र विधायक को कर्नाटक में मंत्री भी बनाया था।

पूरे देश में है बसपा का वोटबैंक

हालांकिे बीते तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बसपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई लेकिन प्रदर्शन बहुत बुरा भी नहीं रहा। राजस्थान में उसे 3.0 फ़ीसदी वोटों के साथ छह सीटें, छत्तीसगढ़ में 4.4 फ़ीसदी के साथ चार सीटें और मध्य प्रदेश में 0.9 फ़ीसदी वोटों के साथ दो सीटें हासिल हुई हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में सबसे कमज़ोर प्रदर्शन रहा लेकिन छत्तीसगढ़ में चार सीटें मिलना मायावती का ही करिश्मा है। अभी बहुत समय नहीं हुआ जब हरियाणा में बसपा से गठबंधन के बाद इनेलो नेता अभय चौटाला लगातार मायावती को तीसरे मोर्चा का नेता बता रहे थे वहीं ममता बनर्जी भी मायावती के समर्थन में खड़ी दिखी थीं। दलित समुदाय भले ही अलग-अलग राज्यों में अलग अलग दिखता हो लेकिन उनको एक साथ रखने की क्षमता इस समय मायावती के अलावा किसी नेता में नहीं दिखती।
अब माया के खिलाफ टिप्पणी भारी पड़ेगी भाजपा को
माया राज में कानून व्यवस्था योगी व अखिलेश के मुकाबले बेहतर रही है इसालिए भाजपा चाहकर भी मायावती को नहीं घेर सकती। मोदी और शाह को मायावती के खिलाफ टिप्पणी पर भी सयंम रखना होगा। क्योंकि भाजपा मायावती को लेकर जितनी ज्यादा कठोर बयानी करेगी, दलित-आदिवासी समाज के 22 फीसदी मतदाताओं के मायावती के पीछे मजबूती से खड़ा होने की संभावना बढ़ती जाएगी। याद दिला दें कि वर्ष 2015 में मायावती ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण की वकालत भी की थी जिसे भाजपा ने लागू भी किया है लेकिन जानकार बताते हैं कि इसका लाभ भी भाजपा को मिलने की संभावना बहुत कम है।

नौकरशाहों पर नकेल कसने में मायावती का जवाब नहीं
मायावती ने अपने राज में नौकरशाहों को समझा दिया था कि वह पहले जनसेवक हैं बाद में अफसर। मंच पर बुलाकर महराजगंज के डीएम व सीडीओ को सस्पेंड करना उनकी शुरूआत भर थी। तहसील दिवस पर डीएम एसडीएम हर हाल में शामिल होते थे। मायावती की एक काल पर अफसरों की नींदें हराम हो जाती थीं। वर्ष 2011 में तो लखनऊ के कप्तान मायावती के दौरे की सूचना पर नंगे पैर ही दौरे स्थल पर पहुंच गये थे। उनकी फोटो लखनऊ के अखबारों में पहले पन्ने पर थी।
कानून व्यवस्था पर तो अपनों को भी नहीं बख्शा
बसपा सांसद रमाकांत यादव पर 2007 में आजमगढ़ में एक घर गिरवाने का आरोप लगा तो मायावती ने सांसद महोदय को अपने घर बुलवाया और पुलिस से गिरफ्तार भी करवा दिया। इसी प्रकार चर्चित शशि हत्याकांड में फंसे बसपा विधायक आनन्द सेन को सलाखों के पीछे पहुंचाने में जरा भी देर नहीं की। अतीक अहमद जैसे बाहुबली को मायावती से खतरा होने लगे तो अंदाजा लगा लेना चाहिए कि बसपा राज में कानून व्यवस्था कितनी कड़ी रही होगी।
कड़े संघर्ष के बाद मिला है मुकाम
अब जबकि भाजपा दलितों की राजनति कर रही है वही काम मायावती ने 25 साल पहले ही कर दिया था। मायावती की एक एक कार्यकर्ता तक जानें की मेहनत ने उन्हें मुकाम तक पहुंचाया है। जाति व मजहब की दीवारों को तोड़ सोशल इंजीनियरिंग का भी फार्मूला भी मायावती का ही था जिसने उन्हें वर्ष 2007 में यूपी की सत्ता ​फिर दिलाई थी। अब मुलायम सिंह यादव लालू यादव राजनीति से दूर हो चले हैं नीतीश कुमार के मोदी के खेमे में चले जाने से विपक्ष में कोई दमदार चेहरा सामने नहीं दिखता। राहुल मोदी का विरोध करते हैं और तीन राज्यों में वह भाजपा को सत्ता से बेदखल कर अपनी ताकत दिखा चुके हैं लेकिन अभी उनमें प्रशासनिक अनुभव की कमी है वहीं चार बार मुख्यमंत्री के रूप में देश के सबसे बड़े सूबे की कमान संभालने वाली मायावती का चेहरा विपक्ष के रूप में ज्यादा दमदार लगता है। कम से कम यूपी से तो यही संदेश निकल कर पूरे देश में जा रहा है।

कमलेश श्रीवास्तव

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