बच्चे सिर्फ अस्पतालों में ही नही स्कूलों में भी मर रहे हैं

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कुमार हर्ष 

मन बहुत परेशान है । थोड़ी देर पहले खबर मिली हैं कि गोरखपुर के सेंट एंथोनी स्कूल मैं पांचवी क्लास में पढ़ने वाले वाले एक बच्चे नवनीत प्रकाश ने अपनी क्लास टीचर की प्रताड़ना के चलते कोई जहरीला पदार्थ खा लिया । उसे मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया जहां आज उसकी मौत हो गई।

उसके स्कूल बैग से से एक सुसाइड नोट मिला है जिसमें उसने क्लास टीचर द्वारा झूठी शिकायत के चलते उसे तीन पीरियड तक मेज पर खड़ा रखें रखने की सजा और उससे उपजे दुख के बारे में लिखा है । कुछ पत्रकार साथियों ने मुझे उसकी कॉपी में लिखी उसकी एक कविता भी भेजी है है । 3 पैराग्राफ की इस कविता में एक ऐसा बच्चा है जो जिंदगी को बहुत खुश और बहुत सुंदर देखना चाहता है , जिसे अपने आसपास की फिक्र है और देश की भी ।

उसकी कविता में उसकी मासूम उम्र की तरह ही एक संवेदनशील मासूमियत और मखमली ख्वाब दिखते हैं। उसकी कविता गवाह है कि वह जरूर बहुत ही संवेदनशील रहा होगा । शायद यही इस क्रूर समय में समय में उसकी मौत की वजहभी बनी होगी। बिना किसी गलती के मिली सजा ने उसे अंदर तक आहत कर दिया । उसका सुसाइड नोट हिला देने वाला है जिसमें उसने लिखा है कि मैं सिर्फ यही चाहता हूं कि किसी बच्चे को इतनी बड़ी सजा ना मिले ।

इस मौत की खबर के बाद मैं लगातार उन बहुत सारे बच्चों और उनके मां-बाप के बारे में सोच रहा हूं जो किसी न किसी किसी वक्त में ऐसी प्रताड़नाओं का शिकार होते रहें हैं या हो रहे हैं । उनमें से बहुत कम इस बात का साहस जुटा पाते हैं कि अपने बच्चे की तकलीफ की शिकायत स्कूल में करें । जो पहुंचते हैं उन्हें अंग्रेजी के कोड़े वाली चाबुक से कई बार मारते हुए टीचर या प्रिंसिपल थोड़ी ही देर में यह बता देता है की गलती बच्चे की है या मां बाप की की। स्कूल का जिम्मा घोड़े को घोड़ा बनाना है गधे को घोड़ा बनाना नहीं ।

बच्चा अगर ठीक नहीं कर रहा तो यहउस स्कूल की गलती नहीं है जिसे आप साल भर में लाखों रुपए का चढ़ावा चढ़ा रहे है । गलती आपकी है कि स्कूल टाइम के बाद आप उसका होमवर्क नहीं करवाते । उसे पढ़ाते नहीं । उसकी तैयारी नहीं करते । स्कूल भला क्या क्या करें ।

लुटा पिटा गार्जियन घर लौट जाता है। कोई कोई अपने अपने बच्चे को मदद करके सजाने-संवारने तैयार करने करने मैं जुट जाता है तो कोई झुंझलाहट में में बच्चे पर गुस्सा उतारने लगता लगता लगता है । ऐसे में कुछ बच्चे अवसाद में डूब जाते हैं और कुछ नवनीत की तरह खुदकुशी कर लेते हैं ।दो-चार 10दिन हल्ला-गुल्ला होता है फिर सन्नाटा छा जाता है । बचपन की कत्लगाहे फिर से आबाद हो जाती है । उसे यूं भी शिकार की कमी नहीं होती। हम खुद अपने बच्चों को , उनके बचपन को, उनके नरम मखमली एहसासों को , उनकी खूबसूरत दुनिया को ,उनके सपनों को ,भारी भरकम स्कूल बैग के बोझ तले दबा कर कर कत्ल के लिए पेश कर देते हैं ।

इस वक्त मैं समझ नहीं पा रहा हूं की वर्षों से मासूमियत का इस तरह से हो रहा कत्लेआम कैसे रुकेगा पर रुकना जरूर जरूर चाहिए। हाईकोर्ट के किसी ऐसे वकील के बारे में भी जानना चाहता हूं जो बच्चों और बचपन के पक्ष में इन कदमों के खिलाफ लड़ने का या लड़ाई में मदद करने का ख्वाहिशमंद हो । अगर आप किसी ऐसे शख्स को जानते हैं हैं तो मुझे जरूर बताइए । अगर हम और आप भी खड़े नहीं होंगे तो कौन खड़ा होगा।

फेसबुक वाल से साभार

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