वीर विनोद छाबड़ा

सैंया दिल में आना रे, आ के फिर नहीं जाना रे…मैं का करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया…बोल रे कठपुतली बोले…औरत ने जन्म दिया मर्दों को…होंठों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आयी…रुला के गया सपना मेरा…मांग के साथ तुम्हारा…बहारों फूल बरसाओ…इक शहंशाह ने बनवा के हंसीं ताजमहल…तुम्हें याद करते करते जायेगी रैन सारी…चढ़ गयो पापी बिछुआ…मैं तो कब से खड़ी इस पार, आ जा रे परदेशी…मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार रे…तुम रूठी रहो मैं मनाता रहूं…पहले मिले थे सपनों में आज सामने पाया…हम प्यार का सौदा करते हैं इक बार…देख हमें आवाज़ ने दो ऐ बेदर्द ज़माने…उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी कुंवारियों का दिल मचले…छोटी सी मुलाक़ात प्यार बन गयी…बदन पे सितारे लपेटे हुए…मेरे पास आओ नज़र तो मिलाओ…दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे…इन गानों को सुनते या गुनगुनाते हुए एक ही नाम बरबस ज़हन में आता है, वैजयंतीमाला।

वैजयंतीमाला ने पचास और साठ के सालों में कहर ढाया था। अभिनय की दुनिया हो या नृत्य वैजयंतीमाला का नाम टॉप पर होता था, सीधा दिल में समा जाने वाला। सिर्फ इतना ही नहीं, वो बतौर औरत बहुत मज़बूत थीं, अपनी शर्तों पर काम करती रहीं, महत्वाकांक्षी भी। ये शुरू से ही उनके व्यक्तित्व का एक मज़बूत पक्ष रहा। जब वो महज 19 साल की थीं तो ‘देवदास'(1955) में चंद्रमुखी के किरदार के लिए मिला बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का प्रतिष्ठित फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड ठुकरा दिया। उनका तर्क था कि चंद्रमुखी का किरदार पारो के किरदार से किसी भी सूरत में कमतर नहीं है, अगर देना है बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड दो। बीआर चोपड़ा की ‘साधना’ (1958) में वेश्या का किरदार कई नाम-चीन अभिनेत्रियों ने करने से मना कर दिया था, इस डर से कि इमेज ख़राब हो जायेगी। मना करने वालियों में निम्मी का नाम भी था। लेकिन वैजयंती ने तुरंत हां कर दी और बड़ी तबियत से इसे अदा भी किया। और मज़े की बात ये कि उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। उसी साल ‘मधुमती’ के लिए भी वो नॉमिनेट हुईं थीं। आगे चल कर वो ‘गंगा-जमुना’ (1961) और फिर ‘संगम’ (1964) के लिए भी फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड से भी विभूषित हुईं। 1996 में उन्हें फ़िल्मफ़ेयर ने लाइफ़टाईम अचीवमेंट अवार्ड के लिए चुना। इसके अलावा भी उन्हें बेशुमार अवार्ड मिले, जिनकी सूची बहुत लंबी है। ये अवार्ड सबूत है कि वो आला दर्जे के अभिनेत्री थीं, कभी ज़ुबां से तो कभी हाव-भाव से दिल के भावों को व्यक्त करने की अभूतपूर्व क्षमता रही। इन फिल्मों में ही नहीं, अनेक फिल्मों में उन्होंने जटिल किरदार निभाए। नागिन, नयादौर, अमरदीप, डॉ विद्या, ज़िंदगी, ज्वेल थीफ़, साथी, फूलों की सेज इसका उदाहरण हैं। इसके अलावा उनकी यादगार फ़िल्में हैं, लड़की, यासमीन, न्यू दिल्ली, आशा, पैगाम, आस का पंछी, नज़राना, झूला, लीडर, ईशारा,सूरज, छोटी सी मुलाक़ात, दुनिया, प्यार ही प्यार, प्रिंस आदि। एवीएम की ‘बहार’ (1951) पहली और नरेश कुमार की ‘गंवार’ (1970) उनकी अंतिम फिल्म थी।
महत्वकांक्षा के मामले में वैजयंती का कोई जवाब नहीं था। चाहे हॉट बोल्ड सीन क्यों न देने पड़ें। ‘संगम’ में उन्होंने सिंगल सूट बिकनी पहनी और मुझे बुड्ढा मिल गया… गाने में ‘बॉडी शो’ का तत्कालीन रिकॉर्ड तोड़ बाकी हीरोइनों के लिए चैलेंज खड़ा कर दिया। एफ.सी.मेहरा की ‘आम्रपाली’ वहीदा रहमान ने इसलिए छोड़ दी क्योंकि उसमें कम वस्त्र पहनने थे, लेकिन वैजयंती ने कबूल कर ली। अब ये अलग बात है कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट गयी। फिल्म गठी हुई स्क्रिप्ट से चलती है, बदन उघाड़ने से नहीं। शुक्र है, उन्होंने भविष्य में ऐसी फ़िल्में नहीं की।
बीस साल की फ़िल्मी यात्रा में वैजयंती को कई तूफानों और विवादों का सामना करना पड़ा। लेकिन वो अपनी स्टैंड पर कायम रहीं। दिलीप कुमार से उनके रिश्ते बहुत प्रगाढ़ रहे। देवदास, पैगाम, मधुमती, नयादौर, गंगा जमुना और लीडर में इस जोड़ी की केमेस्ट्री लाजवाब रही। लेकिन ‘गंगा-जमुना’ के निर्माण के दौरान दिलीप कुमार ने उनके वस्त्रों पर नुक्ता-चीनी की तो वो बिफर गयीं। बात इतनी बढ़ी की संबंधों में खटास आ गयी, ‘नो रिटर्न पॉइंट’ पर पहुँच गए, मगर बावजूद इसके ‘संघर्ष’ (1968) इन्हीं दूरियों के बीच बनी, आपस में बात-चीत तक बंद रही। लेकिन ‘मेरे पास आओ नज़र तो मिलाओ, इन आँखों में तुमको जवानी मिलेगी…’ के फिल्मांकन में पुराना प्यार मानो उमड़ पड़ा था, मानो शकील बदायुनी ने जानबूझ कर रचा था, ताकि गुज़रे हुए हसीं पलों की याद फिर ताज़ा हो जाए। दोनों के बीच अनबन की का एक कारण वैजयंती का राजकपूर की प्रेम त्रिकोण पर आधारित ‘संगम’ की राधा बनने का ऑफर स्वीकार करना भी रहा। ये महबूब खान की दिलीप-नरगिस-राजकपूर अभिनीत ‘अंदाज़’ (1949) का रीमेक थी। बावजूद इसके कि दिलीप-राज अच्छे दोस्त थे, मगर प्रोफेशनल प्रतिद्वंदिता अपने जगह थी। सुना तो ये भी गया कि राजकपूर ने तीसरे कोण के लिए दिलीप कुमार को साइन करना चाहा, मगर दिलीप कुमार ने निराश प्रेमी बनने से मना कर दिया, ये रोल बाद में राजेंद्र कुमार के हिस्से में गया। मैसेज ये गया कि दिलीप कुमार से उनकी धन्नो को राजकपूर ले उड़े। बाद के सालों में ‘राम और श्याम’ के सेट पर वैजयंतीमाला की एक सीन में एंट्री को लेकर दिलीप कुमार से विवाद हुआ। नतीजा वैजयंती ‘आउट’ और वहीदा रहमान ‘इन’। तब लोगों को याद आया ‘नया दौर’ (1957) का वो दौर जब मधुबाला बाहर हुईं थीं और वैजयंतीमाला अंदर, फिल्म में ही नहीं दिलीप कुमार की ज़िंदगी में भी।
‘संगम’ निर्माण के दौरान वैजयंतीमाला की शादी-शुदा और पांच बच्चों के बाप राजकपूर से नज़दीकियां बहुत बढ़ गयीं थीं। चर्चा थी कि दोनों शादी भी करने वाले हैं। गुस्सा होकर राज की पत्नी कृष्णा बच्चों को लेकर दूसरे मकान में शिफ्ट कर गयीं। कपूर खानदान में तहलका मच गया। मामला तभी सुलटा जब वैजयंती राज की ज़िंदगी से बाहर निकल गयी। ऋषि कपूर ने अपनी बायोग्राफी ‘खुल्लम खुल्ला’ में इस सच को स्वीकार किया है, मगर वैजयंती ने अपनी बायोग्राफी ‘बॉन्डिंग’ में राजकपूर से अफ़ेयर से इंकार किया है। ये राजकपूर का एक पब्लिसिटी स्टंट था। हो सकता है वैजयंती सच कह रही हों, मगर कुछ तो था, बिना आग के धुआं नहीं निकलता। सच स्वीकार करने के लिए बड़ा कलेजा चाहिए।
मोहब्बत भी अबूझ दीवानगी है, कभी-कभार बसे-बसाये घर तोड़ देती है। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान वैजयंतीमाला झील में गिर पड़ीं। न्यूमोनिया हो गया। इलाज़ किया कपूर परिवार के फ़ैमिली डॉक्टर चमनलाल बाली ने, जो शादी-शुदा ही नहीं तीन बच्चों का बाप भी था। दोनों इक-दूजे को दिल दे बैठे और 1968 में शादी कर ली। बड़ी भद्द उड़ी थी वैजयंती की। लेकिन बहुत आगे बढ़ चुकी वैजयंती ने परवाह नहीं की। इसके बाद वैजयंती ने फिल्मों को अलविदा कह दिया। सिर्फ वही फ़िल्में कीं, जिनकी शूटिंग पहले से चल रही थी।
कालांतर में उन्हें यश चोपड़ा ने ‘दीवार’ (1975) ऑफर की, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की ‘मां’ बनना मंज़ूर नहीं है। अंततः निरूपाराय को ये रोल मिला। मनोज कुमार ने उन्हें ‘क्रांति’ में दिलीप कुमार की पत्नी बनाना चाहा, लेकिन उन्हें बूढ़ी दिखना गवारा न हुआ। एक बार फिर निरूपाराय को फायदा हुआ। शायद वो अपनी ‘हीरोइन’ की इमेज तोड़ना नहीं चाहती थीं। उन्होंने अगर राजकपूर के साथ ‘सपनों का सौदागर’ मना न की होती तो शायद हेमा मालिनी की एंट्री हिंदी फिल्मों में न हुई होती और होती भी तो कुछ विलंब से होती। गुलज़ार की ‘आंधी’ (1975) उन्होंने इसलिए मना कर दी क्योंकि किरदार में इंदिरा गाँधी की झलक थी और गाँधी परिवार के साथ उनकी नज़दीकियां थीं। उन्हें 1968 में पदमश्री से भी नवाज़ा गया। इंदिरा जी की शहादत के बाद राजीव गाँधी ने 1984 में उन्हें मद्रास साउथ से लोकसभा का टिकट दिया। वो जीतीं भी। 1989 में भी वो कांग्रेस के टिकट पर चुन कर आयीं। बाद में वो राज्यसभा के लिए नॉमिनेट हुईं। 1999 में उन्होंने ये कह कर कांग्रेस छोड़ दी कि पार्टी अपने मूल ‘मूल्यों’ से भटक गयी है। इसके साथ ही वो बीजेपी में चलीं गयीं। मगर वहां भी उन्हें वो मूल्य नहीं दिखे जिसकी उन्हें तलाश थी। फिलवक्त वो किसी भी पार्टी में नहीं हैं। चेन्नई में अपने बेटे-बहु के परिवार के साथ मस्त हैं।
13 अगस्त 1936 को जन्मीं 82 साल की वैजयंतीमाला ने करीब 59 हिंदी फ़िल्में कीं। उन्हें इसलिए भी याद किया जाता है कि वो पहली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्हें हिंदी सिनेमा ने बहुत गंभीरता से लिया और बाकी के लिए फ्लडगेट खोले।

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