चुनाव का पांचवां चरण हो चुका है और लगभग अब सभी दल खुद के बारे में सही सही आकलन कर सकते हैं। भाजपा हो या गठबंधन या फिर कांग्रेस। भाजपा गठबंधन सरकार की संभावनायें तलाश रही है तो अखिलेश माया के सहारे फिर यूपी की गद्दी पाना चाहते हैं। अखिलेश ने मायावती को पीएम बनाने की बात कह कर एक तीर से दो निशाने साध लिए हैं। अखिलेश के राजनीतिक विरोधी यह कह सकते हैं कि उन्होंने अपने पिता मुलायम का नाम पीएम के लिए क्यों नहीं लिया।

सत्ता का सुख भोगने से कभी नहीं चूकेंगी माया

दरअसल अखिलेश मायावती के साथ मिलकर चुनाव जरूर लड़ रहे हैं लेकिन उनकी नजर आने वाले परिणामों पर भी है। मायावती भाजपा पर चाहे जितना भी बरस लें लेकिन जब भी मौका मिलेगा वह भाजपा के साथ मिलकर सत्ता का सुख भोगने से कभी भी नहीं चूकेंगी। भाजपा को समर्थन यह कहते हुए देंगी कि उन्हें दलितों की बड़ी फिक्र है और भाजपा के माध्यम से वह दलितों का उत्थान करेंगी। मायावती को पीएम बनाने के इरादे जताकर अखिलेश ने अपनी बुआ की आंखों में पीएम का सपना छोड़ दिया है। अखिलेश ने मायावती को पीएम बनाने की बात कह कर उन्हें भाजपा की ओर बढ़ने से रोक भी दिया है।

मायावती के भाजपा से हैं पुराने रिश्ते

मायावती से भाजपा के रिश्ते बहुत पुराने हैं। स्टेट गेस्ट हाउस कांड में उन्हें बचाने वाले भाजपा नेता ही थे। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को वह राखी भी बांधती रही हैं। अटल जी यानी भाजपा के सहयोग से मायावती यूपी में सरकार भी चला चुकी हैं। आज भी वह मोदी के खिलाफ उतना मुखर नहीं हैं जितना कि कांग्रेस के खिलाफ। राहुल के खिलाफ आग उगलना न सिर्फ उनकी राजनीतिक मजबूरी है बल्कि आगे का भविष्य भी कांग्रेस विरोध पर ही टिका है।

मुलायम को मोदी से हैं रिटर्न गिफ्ट का इंतजार

मुलायम सिंह राजनीति से संन्यास लेने वाली अवस्था में मोदी जी के गुणगान बेवजह नहीं कर रहे। अखिलेश के अलावा भी उन्हें अपने परिवार की चिंता है। प्रतीक की चिंता है। भाजपा भले ही उन्हें राष्ट्रपति न बनायें लेकिन लालजी टंडन के तरह किसी प्रदेश में लाटसाहब बना कर ही भेज दें। मोदी से संबंधों का इतना लाभ तो मुलायम सिंह हक के साथ ले ही सकते हैं। मोदी को फिर से पीएम बनाने की संसद में इच्छा व्यक्त करने का रिटर्न गिफ्ट तो वह भाजपा से ले ही सकते हैं। भाजपा पर मुलायम रहे अपने पिता से जुड़े किसी भी प्रकार के सवाल से अखिलेश बचते रहे हैं।

बेहद अनुशासित हैं अखिलेश की बुआ

फूलपुर गोरखपुर उपचुनाव में मायावती ने अखिलेश को समर्थन दिया था हालांकि तब अखिलेश मायावती से ठीक से मिले भी नहीं थे। हां आज से ठी​क एक साल पहले मई 2018 में कर्नाटक उपचुनाव के बाद गठबंधन की रूपरेखा बनने लगी थी। अखिलेश खुद कहते हैं कि कर्नाटक चुनाव में बीजेपी के न जीतने से दोनो ही खुश थे। उस समय मायावती जी से बात नहीं हो पाई थी। मायावती ने तब अखिलेश से बात करने में कोइ्र रुचि नहीं दिखाई थी। अखिलेश ने एक मीडिया हाउस को इंटरव्यू में कहा भी कि मायावती से रिश्ते बनाने में उन्होने काफी होमवर्क किया तब जाकर वह महागठबंधन को आकार दे पायें। मायावती की तारीफ करते हुए अखिलेश यह भी कहते हैं कि मायावती बेहद अनुशासित हैं वह मुझसे ज्यादा अनुभवी हैं इसलिए वह प्रधानमंत्री बनें और मुझे फिर से यूपी की सत्ता पाने में मदद करें।

कांग्रेस का विरोध ही माया अखिलेश को करीब लाया

अखिलेश यादव यह भी स्वीकार करते हैं कि कांग्रेस का विरोध ही हमें और उनकी बुआ को करीब लाता है। कांग्रेस को दोनो ही अब अपना दुश्मन नम्बर वन मानते हैं। अखिलेश का कहना है मुलायम और मायावती के पीछे सीबीआई कांग्रेस ने लगवाई थी। अखिलेश कांग्रेस का विरोध मायावती का भरोसा जीतने भर के लिए ही नहीं कर रहे वह जानते हैं कि अगर भाजपा उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पाई तो सरकार बनाने में उनकी बुआ मदद करेंगी और जब बुआ सरकार में होंगी तब भतीजा यूपी में सुरक्षित राजनीति कर पायेगा क्योंकि अभी 2022 दूर है।

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