शंकर सिंह वाघेला ने क्‍यों बदला अपना चोला

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अहमदाबाद। शंकर सिंह वाघेला की राह अब कांग्रेस से अलग हो गई है। यह वही शंकर सिंह वाघेला हैं जो अपनी मोटर साइकिल पर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के साथ अहमदाबाद व सूरत की सडकें नापते थे। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में वाघेला को न सिर्फ बुलाया बल्कि मोटरसाइकिल वाली बात कह उन्‍हें अपना गुरू भी माना था। मोदी यह अच्‍छी तरह जानते हैं कि गुजरात में पहले वाले हालात नहीं हैं। भाजपा के लिए क्‍लीन स्‍वीप यहां अब सपना है। वाघेला को तोडना मोदी की कूटनीतिक चाल है।
कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा झटका
निश्चित रूप से यह गुजरात में कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। शुक्रवार को खुद वाघेला ने पार्टी से निकाले जाने की सूचना दी जबकि पार्टी का कहना है कि उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई। तो क्या निष्कासन की बात वाघेला ने सहानुभूति बटोरने के लिए कही होगी? जो हो, शुक्रवार को ही उनका सतहत्तरवां जन्मदिन था और इस अवसर पर उन्होंने एक रैली आयोजित की थी। पार्टी ने उन्हें यह रैली न करने की चेतावनी दी थी, पर वाघेला नहीं माने। पार्टी ने एक दिन पहले अपने कार्यकर्ताओं को भी कहा था कि वे इस रैली में हिस्सा न लें। इस निर्देश का कितना असर हुआ, पता नहीं, पर वाघेला के समर्थक बड़ी तादाद में इस रैली में पहुंचे। पर यह रैली वाघेला को कांग्रेस से अलग करने की एकमात्र वजह नहीं थी। सच तो यह है कि खटास काफी पहले से चली आ रही थी और रैली का आयोजन इस सिलसिले का चरम था। वाघेला चाहते थे कि उन्हें गुजरात के आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया जाए। माना जाता है कि कांग्रेस के सत्तावन विधायकों में से आधे से अधिक उनकी इस मांग के पक्ष में थे। पर पार्टी-नेतृत्व को यह मंजूर नहीं था। दरअसल, कांग्रेस ने उन पर कभी पूरी तरह विश्वास नहीं किया।
पुराने भाजपाई रहे हैं बाघेला
वाघेला एक समय भाजपा में थे, और बगावत करके, 1996 में कांग्रेस की मदद से मुख्यमंत्री बने थे। भाजपा से अलग होकर उन्होंने आरजेपी यानी राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई थी और फिर बाद में कांग्रेस में उसका विलय कर दिया था। इस तरह वे कांग्रेस में आ तो गए, पर कांग्रेस उनकी पृष्ठभूमि को भुला न सकी। गुजरात में कांग्रेस के मौजूदा नेताओं में जनाधार के मामले में वाघेला की बराबरी कोई नहीं कर सकता। वहां भाजपा को टक्कर देने में कांग्रेस में सबसे समर्थ व्यक्ति वही थे। पर यह तथ्य कांग्रेस को हमेशा चुभता रहा कि भाजपा और आरएसएस, दोनों में वाघेला के काफी मित्र हैं।
फिर, गुजरात कांग्रेस के नेताओं, खासकर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भरतसिंह सोलंकी को यह कतई मंजूर नहीं था कि वाघेला को पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़ा जाए। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व, वाघेला के लिए, पार्टी की प्रदेश इकाई के बाकी नेताओं की नाराजगी मोल लेने को तैयार नहीं था। लिहाजा, धीरे-धीरे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से भी वाघेला की दूरी बढ़ती गई। वाघेला की महत्त्वाकांक्षा पार्टी को भले स्वीकार्य नहीं थी, पर उनकी इस शिकायत में दम था कि गुजरात में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तैयारी नहीं हो रही है। अब तो कांग्रेस की मुश्किल और बढ़ गई है जब उसके पास पिछड़े वर्ग में पैठ रखने वाला वाघेला जैसा कद््दावर राजनीतिक नहीं होगा।
वाघेला की शह पर हुई क्रॉस वोटिंग
महीनों से पार्टी में चलती आ रही खटपट के दौरान वाघेला कहते रहे कि वे भाजपा में शामिल नहीं होंगे। पर उनके अतीत और पाला-बदल के उनके रिकार्ड को देखते हुए पक्के तौर पर क्या कहा जा सकता है! वाघेला अब भाजपा में शामिल हों या अलग पार्टी बनाएं या किसी तीसरे दल में शामिल हों, उनका निष्कासन कांग्रेस को नुकसान ही पहुंचाएगा। राष्ट्रपति पद के चुनाव में कई और राज्यों की तरह गुजरात में भी क्रॉस वोटिंग हुई; अनुमान है कि कम से कम आठ कांग्रेस विधायकों ने विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार के बजाय राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को वोट दिया, और इसके पीछे वाघेला की भूमिका रही होगी। क्या विडंबना है कि जिन वाघेला को एक समय कांग्रेस ने भाजपा को कमजोर करने के लिए गले लगाया था, वही अब उसकी परेशानी का सबब बन गए हैं।

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