नोटबंदी के बाद बदल जाएगी यूपी विधानसभा चुनाव की तस्वीर

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uttar-pradesh-elections-17-1458208669लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उप्र समेत अन्य राज्यों के चुनाव से ऐन पहले बड़े नोटों को बंद करने का फैसला लेकर एक तीर से कई शिकार करने का प्रयास किया है। उप्र में बहुजन समाज पार्टी,कांग्रेस और भाजपा सहित समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों में मोदी के इस फैसले के बाद बौखलाहट साफ देखी जा रही है। लेकिन कोई भी पार्टी काले धन की मुहिम से जुड़े इस फैसले के खिलाफ कुछ भी खुलकर बोलने की स्थिति में नहीं हैं। पिछले एक हफ्ते से बैंकों और एटीएम की लाइन लगाने वाले बैंक उपभोक्ता तो अपनी भड़ास भाजपा और मोदी पर निकाल रहे हैं लेकिन नेता कुछ भी बोलेने को तैयार नहीं हैं। सबसे ज्यादा परेशान तो बिल्डर, ठेकेदार, खनन माफिया और उन चिटफंड कंपनियों के मालिक हैं जो कालेधन के सहारे चुनाव जीतने का सपना सजोएं बैठे थे। उनके तो होश फाख्ता हो गए हैं।
एडीआर की रिपोर्ट को मानें तो उत्तर प्रदेश में इस बार के चुनाव में बड़ी मात्रा में काले धन का इस्तेमाल किया जाना था। एडीआर ने उप्र के अलग-अलग क्षेत्रों की 60 सीटों पर टिकट के संभावित 2200 उम्मीदवारों के बारे में पड़ताल की और पाया कि इन दावेदारों में 21 फीसदी ठेकेदार, 18 फीसदी बिल्डर, 17 फीसदी शिक्षा माफिया, 15 फीसदी चिटफंड कंपनी चलाने वाले और 13 फीसदी खनन माफिया शामिल हैं। ये सभी लोग नेता बनने के लिए चुनाव जीतने के लिए काले धन का इस्तेमाल करने वाले थे। 500 और एक हजार का नोट बंद होने की वजह से इनकी हालत खराब हो गई है। हालांकि कुछ का यह भी मानना है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले खेला गया नोटबंदी का मास्टर स्ट्रोक भाजपा को उल्टा भी पड़ सकता है।
आयोग ने तय की है ये सीमा
चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च को विधानसभा के लिए 28 लाख और लोकसभा चुनाव के लिए 70 लाख रुपए निर्धारित किया है। लेकिन चुनाव के दौरान एक प्रत्याशी दो से दस करोड़ रुपए तक खर्च करता है। फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट (एफआईयू) ने पिछले लोकसभा चुनाव के बाद रिपोर्ट दी थी कि अकेले उत्तर प्रदेश में करीब 500 करोड़ रुपए के काले धन का इस्तेमाल हुआ था। जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान यह राशि 300 करोड़ से ऊपर थी। चुनाव आयोग ने भी 2012 में पंजाब से 12 करोड़ और उत्तर प्रदेश से 37 करोड़ रुपए जब्त किए थे।
चुनाव की गहमागहमी थमी
चुनाव आयोग की लाख पहरेदारी के बावजूद विभिन्न दलों के प्रत्याशी चुनाव में काले धन का उपयोग बड़ी मात्रा में करते हैं। ज्यादातर प्रत्याशी चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद के खर्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को देते हैं। लेकिन, उप्र में एक महीने पहले से ही नोट के जरिये वोट का इंतजाम शुरू हो गया था। बसपा और सपा ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। ये अपने क्षेत्रों बैनर, पोस्टर लगा चुके हैं। रोज कई गाडिय़ां प्रचार में दौड़ रही हैं। लेकिन नोट बंदी के बाद क्षेत्रों में चुनावी गतिविधियां एकाएक ठप हो गई हैं। न तो किसी प्रत्याशी के नए बैनर लगे हैं। न ही पोस्टर और न ही वाल राइटिंग की जा रही है। अभी जनसंपर्क के लिए गाडिय़ां तो दौड़ रही हैं लेकिन प्रचारकों के चेहरे से रंगत गायब है।

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