लकवा को न दें हवा

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मस्तिष्क की बीमारी है लकवा
संयमित जीवनशैली व बचाव ही है लकवे से बचने का बेहतर उपचार
लकवा या स्ट्रोक मस्तिष्क की बीमारी है। यह दो तरह का हो सकता है। पहलाए हार्ट से ब्रेन की ओर जाने या आने वाली खून की नलियों जिन्हें धमनी और शिरा कहा जाता है के फटने और दूसरा उनके बंद हो जाने की वजह से। ज्यादातर मरीजों को धमनी में खराबी की वजह से लकवा का शिकार होना पड़ता है जबकि डिलीवरी के बाद महिलाओं में होने वाला लकवा अक्सर शिरा में खराबी के कारण होता है। ब्रेन में खून की नली के फटने से मरीज को बहुत तेज सिरदर्द ;जैसा जीवन में पहले कभी भी न हुआ होद्ध या उल्टी शुरू हो जाती हैए जो बेहोशीए सांस रुकने और पैरालिसिस यानी लकवे का कारण बन जाता है।
पहचान
छत्रपति शाहू जी महराज चिकित्सा विश्वविद्यालय सीएसएमएमयू लखनऊ के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डॉ. रवीन्द्र कुमार गर्ग कहते हैं कि खून की नलियों के ब्लॉक होने या लीक करने से ब्रेन का प्रभावित हिस्सा काम करना बंद कर देता है जिससे मुताबिक मरीज के हाथ.पांव चलने बंद हो जाते हैंए वह सुन्न हो जाते हैं और प्रभावित हिस्से के काम के मुताबिक मरीज को देखने बोलने, बात समझने या खाना निगलने में दिक्कत होने लगती है। अगर मस्तिष्क का बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ हो तो सांस लेने में दिक्कत हो सकती है और बेहोशी भी आ सकती है। कई बार तो मरीज ठीक.ठाक सोने जाता है, लेकिन जब सुबह उठता है तो पाता है कि उसके एक हाथ.पांव चल नहीं पा रहे। खड़ा होने की कोशिश करता है तो गिर पड़ता है। कभी.कभार तो दिन में ही अचानक खड़े, बैठे या काम करते हुए लकवा मार जाता है।

क्यों होता है लकवा

लकवा का सबसे बड़ा कारण हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत है। जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर रहता है उनमें लकवा होने की सम्भावना ज्यादा रहती है। हालांकिए डायटीबीज, हाई ब्लड कोलैस्ट्रोल, हृदय रोग और मोटापे से ग्रस्त लोगों को भी स्ट्रोक का खतरा बना रहता है। इसके अलावा यदि आप धूम्रपान करते हैं या ज्यादा शराब पीते हैं तब भी इसके होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

लकवे के लक्षण नजर आएं तो तुरंत अस्पताल पहुंचाएं

में लकवा के लक्षण नजर आएं और वह बेहोश हो जाए तो तुरंत उसे एक ओर करवट करके लिटा दें और जितनी जल्दी हो सके, उसे अस्पताल पहुंचाएं। लकवा के मरीजों का इलाज यदि साढ़े चार घंटे के अंदर शुरू कर दिया जाए तो उसके ठीक होने की सम्भावना काफी बढ़ जाती है।
पक्षाघात में आयुर्वेद हैं कारगर
लकवा और पक्षाघात एक दूसरे के पर्यायवाची हैंण् हमारे यहां मान्यता है कि हम सबका शरीर पंच द्रव्य से बना हैण् शरीर में वात पित और कफ से ही सारी क्रियाएं होती हैं इनमें जब तक आपस में साम्य बना रहता है शरीर स्वस्थ रहता है। आपसी तालमेल बिगड़ते ही शरीर व्याधिग्रस्त हो जाता हैण् पक्षाघात भी इन्हीं व्याधियों का परिणाम होता है, यह वातज रोगों की गंभीर स्थिति है। प्रकृति का नियम है कि जब हम शरीर के किसी अंग पर क्षमता से अधिक जोर डालते हैं तो शरीर लडख़ड़ाने लगता है और असमान्य स्थिति में आ जाता है यह हमारे लिए एक चेतावनी होती है जिसे समझा जाना चाहिएण् इसी तरह से शरीर को बेढ़ंगे तरीके से इस्तेमाल करना भी एक कारण होता है, चेतावनियों को नजरअंदाज करते जाने पर शरीर के उस अंग की शांति भंग हो जाती हैऔर कभी कभी उसकी क्रियाओं पर विराम लग जाता है वातज रोगों से शरीर के किसी हिस्से का निष्क्रिय हो जाना ही पक्षघात है।
पक्षाघात के कई कारण होते हैं बहुत अधिक मानसिक कार्य करने के कारण लकवा रोग हो सकता हैण् अचानक किसी तरह का सदमा लग जाना जिसके कारण रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक कष्ट होता है उसे लकवा रोग हो जाता हैण् गलत तरीके के भोजन का सेवन करनेए से भी लकवा हो सकता हैण् मस्तिष्कए रीढ़ की हड्डी में बहुत तेज चोट लग जानेए सिर में किसी बीमारी के कारण तेज दर्द होने सेए दिमाग से सम्बंधित अनेक बीमारियों के हो जाने के कारणए अत्यधिक नशीली दवाईयों के सेवन करने के कारणए अधिक शराब तथा धूम्रपान करने सेए मानसिक तनाव अधिक होने पर लकवा हो जाता है।
किसी को पक्षाघात होने पर भूख कम लगती हैए नींद नहीं आती हैए शारीरिक शक्ति कम हो जाती हैए मन में किसी कार्य के प्रति उत्साह नहीं रहताए लकवाग्रस्त अंग में शून्यता आ जाती हैण् लकवा रोग के हो जाने के कारण शरीर का कोई भी भाग झनझनाने लगता है तथा उसमे खुजलाहट होने लगती हैण् इस रोग के कारण रोगी की पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है और रोगी जिस भोजन का सेवन करता है वह सही तरीके से नहीं पचताए पीडि़त रोगी को कई रोग हो जाते हैं और शरीर के कई अंग दुबले पतले हो जाते हैंण्
लकवा रोग से पीडि़त रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिएए इसके बाद रोगी का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से कराना चाहिएण् इसके लिए आयुर्वेदिक चिकित्सा बेहतर है क्योंकि रोगी की प्रकृति पर आधारित चिकित्सा दी जाती हैण् लकवा रोग से पीडि़त रोगी को प्रतिदिन नींबू पानी का एनिमा लेकर पेट साफ करना चाहिए और शरीर से अधिक से अधिक पसीना निकालना चाहिएण् रोगी को प्रतिदिन भापस्नान कराकर गर्म गीली चादर से लकवाग्रस्त भाग को ढकना चाहिए और धूप से सिंकाई करनी चाहिएण्
पीडि़त यदि बहुत कमजोर हो या रक्तचाप बढ़ गया हो तो गर्म चीजों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिएण् रोगी की रीढ़ की हड्डी पर गर्म या ठंडी सिंकाई करनी चाहिएए पेट पर गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए तथा उसके बाद रोगी को कटिस्नान कराना चाहिएण् रोगी को फलोंए नींबूए नारियल पानीए सब्जियों के रस या आंवले के रस में शहद मिलाकर पीना चाहिएण् रोगी को उपचार कराते समय मानसिक तनाव दूर कर देना चाहिए तथा शारीरिक रूप से आराम करना चाहिए और योगनिद्रा का उपयोग करना चाहिएण् यह सब चिकित्सकीय देखरेख में करने से लकवाग्रस्त रोगी को शीघ्र लाभ होता हैण्

डाण् अजय दत्त शर्मा
आयुर्वेदाचार्य

लकवारू रामबाण है होम्योपैथी

लकवा या पैरालिसिस नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लकवा का एलोपैथी में उपचार होता है पर होम्योपैथी में कई दवाएं रामबाण साबित होती हैं। लकवा जिसे सामान्य भाषा में पक्षाघातए फालिजए कम्पवायु आदि के नाम से जाना जाता है। चिकित्सीय भाषा में पैरालिसिस के नाम से जाना जाता है। लकवा बहुत ही भयंकर रोग है। जो शरीर को गतिहीन बना देता है और लकवाग्रस्त व्यक्ति के विभिन्न भागों के ऐच्छिक गति समाप्त हो जाती है जिससे रोगी दूसरों पर निर्भर हो जाता है।
लकवा का मतलब मांसपेशियों के गति का समाप्त हो जाना तथा शरीर के अन्य भागों से समन्वय समाप्त हो जाना है। जिन भागों में लकवा मारता है जैसे हाथोंए चेहरे व पैर आदि उन विशेष भागों की मांसपेशियों की गति समाप्त हो जाती है। मांसपेशियों की गति के साथ.साथ इसमें संवेदना का आभाव हो जाता है जिससे उस व्यक्ति हो उस स्थान पर दर्दए ठंडकए गर्मी आदि का अहसास नहीं होता है। लम्बे समय तक लकवाग्रस्त रोगी में प्रभावित भाग का रक्त प्रवाह एवं अन्य मेटाबोलिक क्रियाएं लगभग बंद हो जाती हैं। जिससे उस अंग की मांसपेशियां सूखने लगती हैं जिससे बहुत गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

लकवा प्रमुख रूप से इतने प्रकार का हो सकता है।

लकवा जिस अंग को प्रभावित करता है उसके अनुसार उसका विभाजन किया जाता है।

मोनोप्लेजियार इसमें शरीर का एक हाथ या पैर प्रभावित होता है।
डिप्लेजियार जिनमें शरीर के दोनों हाथ या पैर प्रभावित होते हैं।
पैराप्लेजिया जिसमें शरीर के दोनों धड़ प्रभावित हो जाते हैं।
हेमिप्लेजियार इसमें एक तरफ के अंग प्रभावित होते हैं।
क्वाड्रिप्लेजिया इसमें धड़ और चारों हाथ पैर प्रभावित होते हैं।
लकवा के कारण
लकवा हमेश केंद्रीय तंत्रिका तंत्र जिसमें मस्तिष्क एवं स्पाइरल कार्ड शामिल हैं में गड़बड़ी अथवा पेरिफेरल नर्वस सिस्टम में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार है जिसके कारण होता है। निम्न कारण जो तंत्रिका की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं जिसके कारण पक्षाघात होता है।
1रू स्ट्रोक. स्ट्रोक लकवा का मुख्य कारण है। इसमें मस्तिष्क का निश्चित स्थान कार्य करना बंद कर देता है। जिससे शरीर को उचित संकेत भेज एवं प्राप्त नहीं कर पाते हैं। स्ट्रोक हाथ व पैर में लकवा की सम्भावना ज्यादा रहती है।
ट्यूमररू विभिन्न प्रकार के ट्यूमर मस्तिष्क अथवा स्पाइनल कार्ड में पाए जाते हैं वह वहां के रक्त प्रवाह को प्रभावित करके लकवा उत्पन्न करते हैं।
ट्रामा अथवा चोटरू चोट के कारण अंदरूनी रक्त प्रवाह कारण मस्तिष्क एवं स्पाइनल कार्ड में रक्त प्रवाह कम हो जाता है जिससे लकवा हो सकता है।
सेलिब्रल पैल्सि रू ये बच्चों में जन्म के समय होती हे जिसके कारण लकवा हो सकता है। इसके अतिरिक्त निम्न स्थितियां स्पाइनल कार्ड की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं।
1रू स्लिप डिस्क
2रू न्यूरोडिजनरेटिक डिस्क
3रूस्पोन्डोलाइसिस
इसके अतिरिक्त लकवा के अन्य कारण भी हो सकते हैं।
लकवा के लक्षण रू
लकवा को आसानी से पहचाना जा सकता है क्योंकि इसके लक्षण बहुत ही स्पष्ट होते हैं।
1रू रोगी प्रभावित अंग में दर्दए गर्मए ठंंडक आदि का अहसास नहीं कर पाता है। दर्द न होना रोगी के लिए सबसे बड़ा दर्द है।
2रू प्रभावित अंग म झनझनाहाट महसूस हो सकती है।
3रू रोगी अचेता अथवा बेहोशी की अवस्था में जा सकता है।
4रू रोगी की दृष्टि में गड़बड़ी हो सकती है।
लकवा से होने वाली जटिलताएं
यदि लकवा लम्बे समय तक रहता है तो यह प्रभावित अंग को गम्भीर नुकसान पहुंचा सकता है। इसके कारण शरीर मात्र हड्ड्ढडी का ढांचा बन जाता है। रोगी को देखनेए सुनने व बोलने में परेशानी होने लगती है।
गम्भीर लकवाग्रस्त रोगी को चिकित्सालय में भर्ती कराना चाहिए। होम्योपैथी में लकवा का उपचार सम्भव है। होम्योपैथिक उपचार में रोगी के शारीरिकए मानसिक एवं अन्य लक्षणों को दृष्टिगत रखते हुए औषधि का चयन किया जाता है। परंतु ध्यान रहे होम्योपैथिक औषधियां केवल प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह से लेनी चाहिए। कुछ दवाएं जो ज्यादा चलन है उनमें रस टॉस्क नाम की औषधि शरीर के निचले हिस्से का लकवा इसके अतिरिक्त यदि लकवा गीला होने या नमी स्थानों में रहने से होए यदि लकवा टाइफाइड के बुखार के बाद हो उसमें लाभ कारी होती है। इसमें शरीर अंगों में जकडऩ में हो जाती तथा ये लकवा के पुराने मरीजों को बेहद लाभ पहुंचाता है। बच्चों में होने वाले लकवा में लाभकारी होता है।
क्रास्टिकम नाम की यह होम्योपैथी दवा ठंड के कारण लकवा मारने या सर्दियों के मौसम में पैरालिसिस का अटैक पडऩे पर प्रभावी हो सकती है। इसके अलावा जीभ चेहरा या गले पर अचानक पडऩे वाले लकवा में भी कारगर साबित होता है।
बेलाडोना नाम की औषधि से शरीर के सीधी तरफ का लकवा ठीक होता है। इस प्रकार के लकवा से प्रभावित व्यक्ति विक्षिप्त तक हो जाता है। इसमें इसी प्रकार जक्सवोमिका का प्रयोग तब लाभकारी होता है। शरीर का निचला हिस्सा लकवा से प्रभावित हो और उन अंगों हिलाने डुलाने में बहुत जोर लगाना पड़ता हो ऐसे लक्षणों में जक्सवोमिका रामबाण साबित हो सकती है।
लकवा के उपचार में प्रयुक्त होने वाली अन्य औषधियों में कॉस्टिकमए जैलसिमियमए पल्म्बमएडल्कामाराए सल्फरए काकुलसए नैट्रमम्योरए कैलमियाए अर्जेटमए नाइट्रिकमए एकोमाइटए एल्युमिना आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा लकवाग्रस्त रोगी को ताजा खाना देना चाहिए। इसके अतिरिक्त चावल और गेहूं के साथ ही मौसमी फल भी फायदा करते हैं।

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