लखनऊ की गोमती में जहर, मर रही मछलियां

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dead fishes in gomtiलखनऊ के करीब हरगांव चीनी मिल की डिस्टिलरी व अन्य डिस्टिलरियों  द्वारा गोमती नदी में जहरीला रसायन बहाए जाने से इस वजह से मछलियां व अन्य जल जीव मर रहे हैं। पिछले तीन दिनों से मरी हुई सैकड़ों मछलियां गोमती नदी में उतरा रही हैं सुनील यादव व जसवंत सोनकर की यह विशेष खबर हमने कैनविज टाइम्स से साभार ली है|

लखनऊ की गोमती नदी का पानी जहरीला हो गया है। सैकड़ों की तादाद में मछलियों ने दम तोड़ दिया है। तीन दिनों से मछलियां किनारों पर उगी जलकुम्भियों में फंस रही हैं। लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। गोमती को विषैली करने वालों पर कोई कार्रवाई न कर जिम्मेदार अधिकारी एक दूसरे को टोपी पहना कर पल्ला झाड़ रहे हैं। गोमती के किनारे जलकुम्भी में बड़ी-बड़ी मछलियां मर कर फंसी हुई हैं। तटों पर मरी हुई मछलियों का ढेर जमा है जिसे छान कर मछुआरे बाजार में भी बेच रहे हैं। कुडिय़ाघाट समेत तमाम इलाकों में गोमती में रविवार की सुबह बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां उतराती मिलीं। मछुआरों ने बताया कि पिछले दो तीन दिनों से मरी हुई मछलियां बह कर आ रही हैं। उन्होंने बताया कि मछली पकडऩे के दौरान पानी की वजह से पैरों में खुजली होने लगी। जबकि पहले कभी ऐसा नहीं होता था। इसका मतलब है कि पानी में ऐसा विषाक्त केमिकल डाला गया है जो मछलियों के मरने के लिए जिम्मेदार है। सूत्रों ने बताया कि गोमती के किनारे बनी डिस्टलरी फैक्ट्रियां गोमती में पिछले कई दिनों से जहरीला अपशिष्ट छोड़ रही हैं। जिसमें हरगांव की डिस्टलरी प्रमुख है। इसके कारण सीतापुर से लखनऊ के बीच गोमती का पानी जहरीला हो गया है। इस वजह से ही बड़ी संख्या में मछलियां मर रही हैं। मरी मछलियों की खबर तेजी से फैली। लेकिन गोमती प्रदूषण पर निगाह रखने के लिए जिम्मेदार उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इसकी जानकारी नहीं है। मीडिया से मिली जानकारी के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच कराई लेकिन इसके बाद भी उन्हें गोमती का पानी प्रदूषित नहीं मिला। प्रदूषण विभाग के अधिकारियों ने कहा कि शहर के नालों का गंदा पानी बिना शोधन के ही नदी में छोड़ा गया इसलिए मछलियां मरीं। जबकि जिस क्षेत्र में मरी हुई मछलियां उतराती हुई आ रही है। वहां नाले नहीं गिरते हैं। लिहाजा, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिश्वतखोर-कार्यशैली साफ-साफ दिखती है। हाल ही विधानसभा में भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के औचित्य सवाल उठा जिसमें बोर्ड के पूरी तरह नाकाम रहने का सिलसिलेवार प्रमाण सदन में रखा गया था। फिर भी कुछ नहीं हुआ। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों और फैक्ट्रियों की मिलीभगत से गोमती को प्रदूषित करने का सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा तो आने वाले समय में इसका पानी छूने लायक भी नहीं बचेगा|

बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी एसके सिंह ने क्या कहा वह देखें, ‘सीतापुर से लेकर लखनऊ तक का पानी बिल्कुल ठीक है। रोज इसकी गऊघाट और गोमती बैराज पर सैम्पल लेकर जांच की जाती है। रविवार के सैम्पल भी ठीक पाए गए हैं। गोमती में इस समय पानी की बहुत कमी है। कुडिय़ाघाट में रविवार को सीवरेज के गंदे पानी के कारण कुछ मछलियां मरी थीं। सीतापुर से फैक्ट्री का गंदा पानी छोड़ा जाता तो गऊघाट में लिए गए सैम्पल में पकड़ में आ जाता।’  उधर जल संस्थान के जीएम राजीव बाजपेई ने कहा कि गऊघाट जलकल के लिए सीधा गोमती से पानी लिया जाता है। पानी के शोधन के बाद ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जांच करता है। पानी पीने लायक है या नहीं इसकी जांच के बाद उसे शहर में पीने के लिए सप्लाई किया जाता है। उधर एसटीपी की देख-रेख कर रहे मुख्य अभियंता राजेश कुमार खरे ने बताया कि पानी के अपशिष्ट को बाहर करके ही नदी में छोड़ा जाता है। मछलियों के मरने का कारण एसटीपी का पानी नहीं है। आज तक प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने हमें गंदे पानी से सम्बन्धित कोई नोटिस नहीं दिया है। स्पष्ट है कि झूठ कौन बोल रहा है। आम आदमी मरता है तो मरता रहे।

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