पैरेंटस की जेब पर डाका, खामोश हैं आका

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निजी स्‍कूलों की मनमानी पर लाया गया यूपी सरकार के अध्‍यादेश को डिप्‍टी सीएम ने ठेंगा दिखाया है। मार्च 2017 में भाजपा की योगी सरकार बनने के बाद योगी सरकार ने डिप्‍टी सीएम डॉ दिनेश शर्मा के नेतृत्‍व में कमेटी बनाई जिसे अपनी रिपोर्ट जून 2017 तक देनी थी लेकिन वर्ष 2018 तक नहीं दे पाये। दस साल की नगर निगम की सुस्‍ती इतना बडा ओहदा मिलने के बाद भी नहीं टूटी। खैर योगी जी के सख्‍त तेवर के बाद निजी स्‍कूलों पर नियंत्रण के लिए अध्‍यादेश आया जो इसी सत्र से लागू होना था। 9 अप्रैल को राज्‍यपाल की मंजूरी भी मिल गई लेकिन स्‍कूलों को कोई सर्कुलर जारी नहीं किया गया। इस अध्‍यादेश में भी फीस नियामक और मंडल स्‍तर पर कमेटी जैसे छेद बनाये गये या रह गये। सब जानते हैं कि निजी स्‍कूलों में नया सत्र 15 मार्च से शुरू हो चुका था और डिप्‍टी सीएम साहब ने फीस नियामक बनाने के लिए 30 अप्रैल तक का समय दिया । सरकार के जिम्‍मेदारों की ओर से जानबूझ कर निजी स्‍कूल संचालकों को मौका दिया गया और मजबूरन अभिभावकों को स्‍कूल की मनचा‍ही फीस भरनी पडी। आगे का रास्‍ता भी साफ रहे इस लिए निजी स्‍कूल संचालकों ने योगी सरकार के अध्‍यादेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल कर दी है। योगी जी के शिक्षा में सुधार और निजी स्‍कूलों की मनमानी पर नियंत्रण के सपनों में उनके अपनो ने ही सेंधमारी की है। डिप्‍टी सीएम साहब अभिभावकों से फीस की राहत के बारे में कह रहे हैं कि पहले प्रिसिंपल से मिल कर शिकायत कीजिये अगर न मानें तो मंडलायुक्‍त से शिकायत कीजिये। लेकिन शिकायत की कौन कहे निजी स्‍कूल वालों ने सरकार को भी धता बता कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

क्‍या था अध्‍यादेश

बीते दिनों योगी सरकार ने स्कूलों के मनमानी फीस वसूलने पर लगाम लगा कर इससे जुड़े एक अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। इस कानून के दायरे में 20 हजार रुपये सालाना से ज्यादा फीस लेने वाले सभी स्कूल आएंगे। नियमों के मुताबिक स्‍कूल महंगाई दर प्लस 5 फीसदी से ज्यादा फीस नहीं बढ़ा सकेंगे। 12वीं क्लास तक सिर्फ एक ही बार एडमिशन फीस ली जा सकेगी। स्कूल रजिस्ट्रेशन फीस, एडमिशन फीस, परीक्षा शुल्क समेत 4 शुल्क जरूरी होंगे। जबकि बस, मेस, हॉस्टल जैसी सुविधाएं वैकल्पिक होंगी। स्कूल 5 साल तक यूनिफॉर्म में बदलाव नहीं कर पाएंगे। इसके अलावा अभिभावकों को निर्धारित दुकान से किताब और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। 12वीं तक सिर्फ एक बार एडमिशन फीस लगेगी। उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के अनुसार स्कूलों पर नए नियम 2018-19 सेशन से लिए लागू होंगे। पहली बार नियमों का उल्‍लंघन करने पर स्कूलों पर 1 लाख रुपये जबकि दूसरी बार उल्लंघन करने पर 5 लाख रुपये जुर्माना लगेगा। तीसरी बार भी नियमों का उल्‍लंघन किया तो स्‍कूल की मान्‍यता रद्द कर दी जाएगी।

5% से ज्यादा नहीं बढ़ा सकेंगे फीस
अध्यादेश के मुताबिक, निजी स्कूल वार्षिक फीस में 5 फीसदी से अधिक वृद्धि नहीं कर सकेंगे. स्कूलों को फीस स्ट्रक्चर अनिवार्य रूप से वेबसाइट पर प्रदर्शित करना होगा. वहीं, स्कूल अब एडमिशन फीस सिर्फ एक बार ही वसूल सकेंगे. फीस निर्धारण के लिए 2015-16 को आधार वर्ष माना जाएगा.

दो भागों में फीस स्ट्रक्चरफीस पर मनमानी रोकने के लिए इसे दो स्ट्रक्चर बनाए जाएंगे. पहले भाग में संभावित शुल्क होगा, जिसमें पंजीकरण, प्रवेश, परीक्षा और संयुक्त वार्षिक शुल्क शामिल होगा. इसके अलावा वैकल्पिक शुल्क में बस का किराया, बोर्डिंग, मेस, डाइनिंग, शैक्षणिक भ्रमण और अन्य फीस शामिल होगी. ये सभी शुल्क तभी लिए जा सकेंगे जब, छात्र इन सेवाओं का इस्तेमाल कर रहा होगा.

योगी सरकार के फीस अध्यादेश के खिलाफ निजी स्कूलों के संगठन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इनडिपेन्डेंट स्कूल्स फेडरेशन आफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर लाये गये फीस अध्यादेश को असंवैधानिक घोषित कर रद्द किये जाने की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि ये अध्यादेश समानता के अधिकार और रोजगार की आजादी के मौलिक अधिकारों का हनन करता है. याचिका में अध्यादेश पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई है. उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी साल 9 अप्रैल को फीस अध्यादेश जारी कर निजी स्कूलों की फीस नियमित करने के नियम बनाए हैं.याचिकाकर्ता का कहना है कि सीबीएसई और आईसीएससी बोर्ड से संबंधित स्कूलों को पहले ही राज्य सरकार शिक्षकों की योग्यता और फीस तय करने के बारे में अनापत्ति प्रमाणपत्र दे चुकी है. सीबीएसई पहले ही शिक्षकों को अच्छा वेतन देने के लिए फीस स्ट्रक्चर तय करने की कमेटी बना चुका है.

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