योगी राज में अखिलेश की यश गाथा

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अतीक अहमद की यश गाथा गाने वाले इमरान प्रतापगढी को भी मिल चुका है यश सम्‍मान 

यश भारती से भाजपा कार्यकर्ता नरेन्‍द्र सिंह राणा ने मुख्‍यमंत्री से पेंशन शुरू करने की थी मांग

जाते जाते थोक के भाव तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने बांटे थे पुरस्‍कार

सत्‍ता में आते ही यश भारती सम्‍मान की जांच का ऐलान करने वाली योगी सरकार 10 महीनों में ही इस पर मेहरबान हो गई है। रेवडी की तरह बांटे गये यशभारती सम्‍मान की जांच की आंच अब हमेशा के लिए ठंडी हो गई है। भाजपा के कार्यकर्ता भी यूपी का यश बढाने के लिए पूर्व मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के हाथों सम्‍मानित हो चुके थे सो उन्‍होंने भी योगी जी को पत्र लिख कर अपना यश बचाने की गुहार तक लगा ली। 11 लाख रुपये और आजीवन पचास हजार की पेंशन वाले यश सम्‍मान को अखिलेश सरकार ने दोनों हाथों से खुल कर बांटा। एक तरफ माफिया अतीक अहमद की यश गाथा गाने वाले इमरान प्रतापगढी तक सम्‍मानित हो गये तो दूसरी तरफ यश भारती सम्‍मान समारोह का संचालन करने वाली एंकर आनन फानन में सम्‍मानित हो गई। तत्‍कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कार्यालय के एक ओएसडी ने खुद ही अपने नाम की अनुशंसा की और उसे पुरस्कार मिल भी गया। एक बडे अखबार के सम्‍पादक की सिफारिश यश भारती दिलाने में कामयाब रही। इंडियन एक्सप्रेस को आरटीआई के तहत अखिलेश यादव के कार्यकाल में यश भारती पाने वाले 142 लोगों का ब्योरा मिला था। हालांकि एक अनुमान के मुताबिक अखिलेश सरकार ने करीब 200 लोगों को ये पुरस्कार दिया था। तमाम पत्रकार भी यश सम्‍मान पा गये। यश सम्‍मान के लिए योग्‍यता के कोई मापदंड थे ही नहीं। यश भारती पुरस्कार और पेंशन के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कार्यालय के एक ओएसडी ने खुद ही अपने नाम की अनुशंसा की और उसे पुरस्कार मिल भी गया।

बताते चलें कि यूपी का नाम रोशन करने वालों को सम्‍मानित करने की पवित्र पहल 1994 में शुरू की गई थी। यूपी की कला संस्‍कृति व साहित्‍य के क्षेत्र में उतकृष्‍ट योगदान करने वालों को सम्‍मानित किया जाता रहा है। यह पुरस्कार अमिताभ बच्चन, हरिवंश राय बच्चन, अभिषेक बच्चन, जया बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, शुभा मुद्गल, रेखा भारद्वाज, रीता गांगुली, कैलाश खेर, अरुणिमा सिन्हा, नवाज़ुद्दीन सिद्द़ीकी़, नसीरूद्दीन शाह, रविंद्र जैन, भुवनेश्वर कुमार जैसी हस्तियों को मिल चुका है. पूर्व की अखिलेश सरकार ने थोक के भाव यशभारती पुरस्‍कार बांटे थे जिससे न सिर्फ इसकी गरिमा गिरी बल्कि साहित्‍य व कलाजगत में इसकी घनघोर आलोचना भी हुई थी।

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