क्यों विदेश भेजे जा रहे हैं हमारे बच्चे!

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प्रदेश के अनाथ आश्रमों पर तस्करों की नजर है। अब बच्चे अनाथ आश्रम की चारदीवारी से बाहर निकलते हैं तो वे किसी मां की गोद में नहीं जाते बल्कि तस्करों के चंगुल में फंस रहे हैं। कानून की पहुंच से दूर रहने के कारण तस्करों ने अनाथ आश्रमों का रुख कर लिया है। खास बात है कि उत्तर प्रदेश बच्चों की तस्करी का मुख्य केंन्द्र बिंदु बन गया है। यहां बच्चों को कानूनी तौर पर गोद लेकर उनकी तस्करी धड़ल्ले से हो रही है। गोद देने के नाम पर उत्तर प्रदेश से हो रही है मासूम बच्चों की बेतहाशा तस्करी पर  संतोषी दास की पड़ताल। यह खबर कैनविज टाइम्स से साभार ली है।

अब बच्चों को गोद लेकर उन्हें विदेशों में भेजा जा रहा है। विदेशियों को गोद देने के नाम पर बच्चे महंगे दामों पर सप्लाई किए जा रहे हैं। जब यह बच्चे विदेश जाते हैं उसके बाद उनका क्या होता है, यह उन एडॉप्शन एजेंसी को भी नहीं मालूम? ऐसा ही एक एडॉप्शन सेंटर राजधानी के मोतीनगर में चल रहा है जो प्रदेश का एकमात्र एडॉप्शन सेंटर है जहां से बच्चे विदेशी नागरिकों को गोद दिए जाते हैं। संस्था बच्चों को गोद दे देती है मगर उनके पास उन विदेश भेजे गए बच्चों की मॉनीटरिंग रिपोर्ट नहीं है। 2009 में कोर्ट ने विदेश भेजे गए बच्च्चों के फॉलोअप की रिपोर्ट मांगी थी मगर उस पेशी में कोई उपस्थित ही नहीं हुआ। कई बार एक ही विदेशी नागरिकों को एक साथ तीन-तीन बच्चे गोद दे दिए गए हैं। आखिर वे यहां से इतनी संख्या में बच्चों को ले जा रहे हैं उनका पालन पोषण वहां हो रहा है या फिर अनाथ बच्चों का वहां शोषण हो रहा है। बच्चों के लिए संचालित संस्था सक्षम फांउडेशन की अंजलि सिंह प्रदेश में हो रहे बच्च्चों की तस्करी पर शोध कर रही हैं। उनका कहना है कि तस्करों ने तस्करी का नए-नए तरीके अख्तियार कर लिए हैं। उन्होंने कहा कि कई विदेशी ऐसे भी थे जो बच्चा गोद लेने तो आए मगर वे शादीशुदा नहीं थे। उन्होंने यहां बच्चे को गोद लेने के बाद शादी इसलिए की क्योंकि कानूनी तौर पर बच्चा उन्हें तभी मिल सकता है जब वे अपनी शादी का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करते हैं। अंजलि सिंह ने बताया कि उन्होंने हाईकोर्ट में विदेशी नागरिकों को बच्चा गोद दिए जाने के खिलाफ याचिका दायर की है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश बच्चों का हाई सप्लाई जोन बन गया है। दिल्ली और गोवा के बाद उत्तर प्रदेश मानव तस्करी का मुख्य गढ़ बन गया है। बच्चों से लेकर बड़े जिनकी भी तस्करी हो रही है वह यूपी से होकर गुजरते हैं। नेपाली लडक़े और लड़कियों को यूपी के रास्ते से ही तस्कर विदेश भेज रहे हैं। नौकरी का झांसा देकर सैकड़ों लडक़े लड़कियां नेपाल से प्रदेश में आ रहे हैं। रिकॉर्ड के अनुसार तस्करों की नजर में इन दिनों बच्चे अधिक हैं। इसमें 6 से 16 वर्ष तक के बच्चों की तस्करी 26 प्रतिशत हो रही है। यही वजह है कि अनाथ आश्रम और एडॉप्शन सेंटर बच्चों को गोद लेने की आड़ में तस्करी कर रहे हैं। ज्यादा संदेह विदेशी नागरिकों पर ही होता है कि वह भारतीय बच्चों को इतनी बड़ी तादाद में लेकर जा रहे हैं। विचित्र तथ्य यह है कि विदेश ले जाए जाने वाले बच्चों में अधिक संख्या लड़कियों की होती है, लडक़े कम संख्या में विदेश ले जाए जा रहे हैं।

विदेशियों के बारे में पुलिस से पड़ताल कराई जाती है
मोती नगर स्थित आईसीए (इंटरनेशनल चाइल्ड एडॉप्शन सेंटर) की अधीक्षिका शिल्पी सक्सेना ने बताया कि यहां बच्चा गोद दिए जाने के पहले जो भी विदेशी नागरिक आवेदक होते हैं उनकी पुलिस से जांच कराई जाती है। गोद देने के बाद हम लोग बराबर बच्चे का फॉलोअप लेते हैं। कई विदेशी जिन्होंने यहां से बच्चा गोद लिया होता है वो अपने बच्चे को लेकर भी आते हैं।

विदेशियों को बच्चे जांच परख
कर दिए जाते हैं
उत्तर प्रदेश महिला एवं बाल कल्याण विभाग के निदेशक बिहारी स्वरूप का कहना है कि जो बच्चे विदेशों में गोद दिए जाते जाते हैं उन्हें जांच परख कर ही दिया जाता है। अभी तक हमारे सामने किसी भी बच्चे के साथ गलत व्यवहार होने की सूचना नहीं आई। बच्चों केबारे में सूचनाएं प्राप्त करने का जरिया क्या है और इसे कौन अधिकारी देखता है इसका जवाब सरकार के पास नहीं है।

इंतजार में पथरा गई आखें

राजेश पटेल

इलाहाबाद। इंतजार करते-करते आंखें पथरा गईं। लेकिन एक बार घर से निकले तो फिर उनका कोई पता नहीं चला। पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। जितना संभव हो सका, खोजा। कोई पता नहीं। पुलिस ने भी फाइल बंद कर दीं। आखिर बेटियां, बहुएं, बच्चे गए तो गए कहां। आसमान खा गया, या धरती निगल गई। क्या पता। अब तो यादें ही शेष हैं।
उत्तर प्रदेश में 20 साल में 4956 लोग लापता हो गए। आज तक अता-पता नहीं चला। नाबालिग लड़कियां वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेल दी गईं या सामूहिक दुराचार के बाद उनकी हत्या कर शव को ठिकाने लगा दिया गया? छोटे-छोटे बच्चे किस हाल में हैं? उनसे भीख मंगवाई जा रही है या कुछ और अपराध की अंधेरी सुरंग में कहीं भटक गए? जवान शादी-शुदा औरतें क्या कर रही हैं और किस हाल में हैं? बूढ़ों की मौत हो गई या कहीं साधु-संत बन गए? ये प्रश्न अनुत्तरित हैं। सब कुछ अंधेरे में है। अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। क्योंकि इनके बारे में न तो अभी तक परिजनों को कुछ पता चल सका न ही पुलिस को। इलाहाबाद में मात्र पांच साल में गायब हुए लोगों में 76 के बारे में कोई सूचना नहीं मिल सकी है। जिंदा भी हैं या मारे गए या आत्महत्या कर ली। क्या पता, बेचारे किस हाल में हैं। अतरसुइया थाना क्षेत्र से सात, बारा से एक, कैंट से दो, सिविल लाइंस से दो, करनलगंज से चार, दारागंज से चार, धूमनगंज से सात, जार्जटाउन से तीन, हंडिया से सात, झूंसी से तीन, करछना से एक, कौंधियारा तथा खीरी से तीन-तीन और कोरांव थाना क्षेत्र से एक समेत पूरे जिले से 76 लोग अभी तक गुम ही हैं। इनके घर वाले अभी भी निराश नहीं हुए हैं।
कौंधियारा का अमित कुमार हो, या अतरसुइया की अपराजिता चौधरी। नैनी का अजय उर्फ गोलू। मऊआइया में की इशरत जहां। धूमनगंज की रीता। मु_ïीगंज की श्रद्धा पांडेय। या जार्ज टाउन थाना क्षेत्र की अलका पांडेय। बारा की कुमारी पूजा भी गुम है। अतरसुइया की रेनू साहू। सिविल लाइंस की सीता भी। फूलपुर की इशरत आरा। करछना का अजय कुमार। दारागंज की प्रियंका कुशवाहा। मु_ïीगंज थाना क्षेत्र की शिल्पी श्रीवास्तव। सभी के अपने रोज रोते हैं। हर दिन इनके घर में गमी जैसा माहौल रहता है। आखिर ऐसा हो भी क्यों न। इनमें से किसी की उम्र २५ पार नहीं है। कोई पढ़ाई कर रहा था, तो कोई घर में गृहस्थी संभाल रही थी। दिन भर तो लोग अपने काम में व्यस्त रहते हैं। शाम को जब डाइनिंग टेबुल या ठहर पर खाने के लिए परिवार बैठता है तो एक शख्स की कमी हर व्यंजन के स्वाद को फीकी कर देती है। निवाला अटकने लगता है। क्या करें। जिसके अपने उनके सामने ही खो जाते हैं, उसका दर्द उनके अलावा दूसरा समझ भी नहीं सकता। शायद यही कारण है कि पुलिस भी इनके दर्द को नहीं समझती। दो-चार बार थाने दौडऩे के बाद लोग नाउम्मीद हो जाते हैं। फिर भगवान पर ही भरोसा कर संतोष कर लेते हैं। यह कहते हुए कि कहीं भी रहे, सुखी व जीवित रहे।

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