गायकी के जूनून में उंगलियां जला बैठती थीं सुरों की मलिका गिरिजा देवी

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वाराणसी गिरिजा देवी नहीं रहीं। सहसा किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि यू अचानक ही सबको छोड़ कर चली जायेंगी गिरिजा देवी। पद्म विभूषण और पद्मश्री से सम्मानित ठुमरी गायिका गिरिजा देवी का मंगलवार को कोलकाता में निधन हो गया। वे 88 साल की थीं। काशी में जो घर उनके रहने पर हमेशा गुलजार रहता था आज वहां सन्नाटा पसरा है। गिरिजा देवी आखिरी बार अपने घर बनारस 24 अप्रैल 2017 को एक संगीत कार्यक्रम में पहुंची थीं। उनके साथ पद्म विभूषण आशा भोसले भी थीं। मंच पर उन्होंने गिरिजा देवी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। गिरिजा देवी के सामने गाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं आशा भोसले…
– काशी के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी दो गायिकाएं एक ही मंच पर थीं। आशा भोसले ने गिरजा देवी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया था और उनके सामने वो गाने की हिम्मत तक नहीं कर पा रही थीं। – आशा जी ने कहा था कि आरडी बर्मन भी उन्हें गिरजा देवी के गाने सुनने की बात किया करते थे। – बता दें, 2015 में अस्सीघाट के एक कार्यक्रम के उद्धघाटन में पहुंची नाव तक जाने के लिए सेना के हाथों पर गईं।

‘ठुमरी क्वीन’ के नाम से थी मशहूर

– 8 मई 1929 को गिरिजा देवी का जन्म बनारस में जमींदार परिवार में हुआ था। महज 5 साल की उम्र में उनके पिता रामदेव राय ने उन्हें म्यूजिक सिखाना शुरू कर दिया था। उनके पहले गुरु पंडित सरजू महाराज थे।नौ साल की उम्र में पंडित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत सीखा। इसी दौरान उन्होंने फिल्म ‘याद रहे’ में भी बतौर एक्ट्रेस काम किया।- 1946 में एक कारोबारी परिवार में उनकी शादी हो गई। उन्होंने 1949 में ऑल इंडिया रेडियो से गायन की शुरुआत की, लेकिन उन्हें मां और बड़ी बहन का विरोध झेलना पड़ा। उनकी कजरी ‘बरसन लागी’ काफी मशहूर हुई थी। उन्हें ‘ठुमरी क्वीन’ कहा जाता था।- उन्होंने आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी (कोलकाता) और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के म्यूजिक डिपार्टमेंट में भी अपनी सेवाएं। वे आखिर तक गायन से जुड़ी रहींं।

गिरिजा खाना बनाते वक्त संगीत की कॉपी साथ रखती थीं, इस जुनून में कई बार उंगलियां जला बैठीं
– चाहे विलंबित लय की ठुमरी हो, मध्य लय की ठुमरी हो, गत भाव ठुमरी हो, भाव नृत्य ठुमरी हो, बोल बनाव हो या बोल बांट ठुमरी हो, सबकी मुर्की, किटगिरी और पुकार में एक जैसा रस होता था। उनकी आवाज में भीतर से एक खनक थी। इस वजह से उनकी आवाज और सुरीली हो जाती है।इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- “मैं खाना बनाते हुए रसोई में अपनी संगीत की कॉपी साथ रखती थी और तानें याद करती थी। अक्सर रोटी सेंकते वक्त मेरा हाथ जल जाता था, क्योंकि तवे पर रोटी होती ही नहीं थी। मैंने संगीत के जुनून में बहुत बार उंगलियां जलाई हैं।”
ये थे अचीवमेंट्स
– पद्मश्री- 1972
– पद्मभूषण- 1989
– पद्मविभूषण- 2016
– संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड- 1977
– महासंगीत सम्मान- 2012
– संगीत सम्मान अवार्ड-
– गीमा अवार्ड- 2012 (लाइफ टाइम अचीवमेंट)

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